Monday, July 13, 2015

मज़हब और रूहानियक में फर्क


- विनोबा - 


रूहानियत मज़हब से अलग चीज़ है। मज़हब हर ज़माने में, हर कौम के लिए और हर समय के लिए नहीं होता, पर रूहानियत होती है। जैसे प्यार करना, सच बोलना, रहम खाना रूहानियत है। वैसे ही अल्लाह की इबादत करना भी रूहानियत है। लेकिन अल्लाह की इबादत के लिए घुटने टेकना, मगरिब या मशरिक की तरफ मुँह करना - ये सब मज़हब है। अल्लाह के लिए दिल में भक्ति रखो, अल्लाह को हमेशा याद करो, अल्लाह की फिक्र रखों - यह रूहानियत है। सीढियाँ बनाई गईं हैं। इन्सान सीढ़ी पर चढ़ा, लेकिन बीच में ही खड़ा रहा, तो ऊपर पहुँचने के बजाए बीच में ही रुक जाता है। मज़हब इन्सान को एक हद तक मदद पहुँचाता है और बाद में रुकावट बन जाता है। वे नहीं समझते कि मज़हब बदलाता है, न बदलने वाला चीज़ रूहानियत है। मरने के बाद दफनाया जाए या दहन किया जाए? हिन्दू होगा तो दहन करेगा, मुसलमान होगा तो दफन करेगा, पारसी होगा तो वैसे ही मैदान में रख आएगा। यह सब हो गया मज़हब। लेकिन हिन्दू हो या मुसलमान, दूसरा कोई भी हो, अपने मरे बाप की लाश घर में नहीं रखेगा. बल्कि बाईज्जत उसे भगवान के हवाले कर देगा।
दिल्ली जाना है। जाने के लिए पाँच-दस रास्ते हैं। जिस किसी भी रास्ते से जाएँ, मुकाम पर तो पहुँच ही जाएँगे। मज़हब के तरीकों में कभी-कभी फर्क होता है इसलिए मज़हब वाले कभी-कभी नाहक झगड़ते हैं। जैसे कभी ज़बान के झगड़े होते हैं तो कभी जाति के, कभी सूबे को लेकर तो कभी मुल्क के दीगर सवाल को लेकर, उसी तरह मज़हब के भई झगड़े होते हैं। मैं नहीं समझता कि ऐसे झगड़े क्यों होने चाहिए। मज़हब से भी जज़्बा पैदा होता है। 

मुझसे लोग पूछते हैं कि क्या आप कुरान शरीफ पढ़ते हैं? मैं कहता हूँ - जी हाँ। फिर पूछते हैं - क्या उन आयतों पर चलते हैं? जी नहीं, क्योंकि जिस आयत से मुझे जितना ले लेना होता है, उतना लेता हूँ। मगर किसी आयत का, गीता का, कुरान शऱीफ का, बाइबल या किसी भी किताब का बोझ नहीं उठाता। उसमें जो बात जँचती है, उसे ले लेता हूँ।
कई धर्मवाले मूर्तिपूजा नहीं चाहते, लेकिन किताबपरस्त ज़रूर बन जाते हैं। वे किताब के बारे में कुछ खास जानते तो नहीं हैं। एक जगह मुझसे मिलने के लिए कुछ पण्डित लोग आए थे। वे वेद नहीं पढ़ सके। वेद नहीं समझ पाए तो कोई बात नहीं, क्योंकि वह बहुत कठिन चीज़ है। किन्तु पढ़ते समय वे उच्चारण भी ठीक नहीं करते थे। ऐसी हालत है उनकी। इस पर भी कितनी ज़िद रखते हैं। वे किताब को पकड़े रहते हैं, उसे सिर पर उठाए रहते हैं।
धर्मग्रन्थ और धर्मशास्त्र इन्सान के लिए होते हैं या इन्सान उनके लिए? किताब में से ऐसी ही चीज़ लेनी चाहिए, जो अपने लिए मुफीद हो। दवा की किताब में हर तरह की बामारी की, मर्ज की दवा बताई होती है। पर क्या सभी दवा मुझे लेनी ही चाहिए? नहीं। मेरे मर्ज के लिए जिसकी ज़रूरत हो, वही लेनी चाहिए। किताब में पचासों चीज़ें होती हैं। उनमें से कुछ ही ऐसी होती हैं, जो सबके लिए हैं। उसी का नाम है रूहानियत। जैसे, एक दूसरे को सत्य पर चलने के लिए मदद करो। एक-दूसरे पर रहम रखना सिखाओ। हक, सब्र, खिदमत ये सब सबको लागू होते हैं। पारसी, हिन्दू, मुसलमान आदि सभी धर्मवालों पर लागू होते हैं। इसी का नाम है रूहानियत।
कुछ लोग रात में फाका करते हैं, कुछ लोग दिन में। जैन लोग शाम को सूरज डूबने से पहले खा लेंगे। वे कहते हैं कि रात में चूल्हा जलने से जन्तु, कीड़े, आदि मरते हैं। मुसलमान रोज़ा रखते है। वे रात में खाएँगे, दिन में नहीं। स्वास्थ्य रखने के लिए फाका करना - यह है रूहानियत। ज़ियारत के लिए मक्का जाना, अजमेरा जाना या काशी जाना, अमरनाथ जाना - यह सब है मज़हब, लेकिन कभी-कभी घर छोड़कर खिदमत के लिए बाहर निकलना - यह रूहानियत है। मैं काशी गया। वहाँ मुझे खुशी हुई। अजमेर गया, वहाँ भी खुशी हुई। जहाँ-जहाँ जियारत की जगह है, वहाँ-वहाँ मुझे खुशी होती है, बहुत ताकत मिलती है। कुछ अमरनाथ जाने वालों को देखकर कहते हैं कि ये कितने मूर्ख हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। जहाँ-जहाँ यात्रा के स्थल हैं, तीर्थक्षेत्र हैं, वहाँ-वहाँ जाना अच्छा ही है। रूहानियत और मज़हब में फर्क में समझ लेना चाहिए।

धर्म के नाम पर चलनेवाले लोग रीति-रिवाज़ों से चिपके रहते हैं इसलिए झगड़ते रहते हैं। वे मूल चीज़ को पकड़ नहीं पाते। ये तो एक-दूसरे की किताब पढ़ते नहीं हैं। मैंने कुरान शरीफ पढ़ा है और उसमें अनमोल रत्न पाए हैं। गीता में गोता लागाया है और वहाँ जवाहर पाए हैं। बाइबल पढ़ी और उसमें भी बहुत अच्छी नसीहत पाई हैं। पंजाब में गुरु नानक की किताबें पढ़ीं और वहाँ भी उम्दा चीज़ें पाईं। झगड़ा करने वाले झगड़ा करें, लेकिन मैने देखा कि गुरु नानक, मुहम्मद, ईसा, मूसा, बुद्ध, रामस कृष्ण - ये सब लड़नेवाले नहीं थे। फिर भी उनके भक्त कहलानेवाले आपस में लड़ते रहते हैं, एक-दूसरे को उभाड़ते रहते हैं। कौमों में फसाद, झगड़ा कराते रहते हैं। यह सारा पाप है। धर्म के नाम पर यह सब करना तो दोहरा पाप है। धर्म की इस गौण और बदलनेवाली बातों के पीछे हम कब तक पागल बने रहेंगे।

Thursday, January 1, 2015

मानवता की पुकार

- विनोबा

 (विनोबाजी का यह लेख आचार्यकुल पत्रिका (दिसम्बर 2014) के अंक में मैंने पढ़ा और महसूस किया कि इसे सबको साथ साझा करना चाहिए। आज जो धार्मिक और सामाजिक आचरण में अधिकाधिक विवेकशून्यता और असहिष्णुता का माहौल बनते जा रहा है, उस समय इसे पढ़ना मेरे खयाल से उपयोगी होगा।)

आज सारी दुनिया में एक चाह है। कोई शक्ति उसे खींच रही है। यह शक्ति है मानवता, जो मानव से कह रही है कि हे मानव तू अ-मानव बन गया है, अपनी यह अ- मानवता फेंक दे, अपना निज का स्वरूप देख और फिर से मानव बन! इस तरह मावता पुकार रही है, आह्वान कर रही है, जिसके कारण सबका झुकाव उस ओर हो रहा है। अब सारा मानव-समाज अत्यन्त वेग से बदलने वाला है।
एक बार एक जैन लड़के से पूछा "तू कौन है - जैन या मनुष्य?प्रश्न सुनकर लड़के को मज़ा आया। परन्तु उनने ज़रा भी विचार किए सीधा जवाब दिया - मैं मनुष्य हूँ। एक छोटा सा बच्चा भी इतना जानता है कि मैं सबसे पहले मनुष्य हूँ और बाद में और सबकुछ! परन्तु बड़े आदमी इतनी सीधी सी बात भी नहीं समझ सकते। मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म क्या है, इसके चर्चा करते-करते नीतिशास्त्र ने कहा है, मनुष्यता! उस लड़के ने भी तो यही कहा। मनुष्यता के मुख्य धर्म को याद रखकर हमें संसार में सब काम करना चाहिए। हिन्दु, मुसलमान, ब्राह्मण, ब्राह्मणेतर सब याद रखें कि पहले हम मनुष्य हैं। मनुष्यता को छोड़कर हम हिन्दु, मुसलमान, ब्राह्मण, ब्राह्मणेतर कुछ भी नहीं रह जाते। हिन्दु भी तो आदमी ही होता है। जो आदमी नहीं वह हिन्दु कैसे? वैसे ही मुसलमान और अन्य भी कैसे? लड़ने की ज़रूरत पड़े तो लड़िए, झगड़िए, उसमें आपत्ति नहीं; पर मानवता मत छोडिए। सम्भवतः वह लड़का पूछेगा, क्यों जी, मनुष्यता लड़ना आता है? मानवता में लड़ना न आए फिर भी कम से कम लड़ने में तो मानवता रखें।
इसाई, इस्लाम, बौद्ध, वैदिक इन सब धर्मों के पास अपने-अपने अनुभव हैं, मानवता के अलावा। बहुत से लोग कहते हैं कि हमने मानवता का, करुणा का काम किया तो धर्मातरण किया। मैं कहूँगा कि मानवता तो कम से कम धर्म है। हिन्दू धर्म मानव-करुणा से कुछ अधिक है। इस्लाम भी उससे कुछ अधिक है। बैद्ध भी अधिक है और इसाई भी।
यह जो कुछ अधिक है, वह छोड़ दें, तो सब धर्मों का यह हाईएस्ट कॉमन फैक्टर (उच्चतम समान अंश) मानवता होगा। उसको कहते है हाईएस्ट (उच्चतम) लेकिन वह है लोएस्च (लघुतम)। भिन्न-भिन्न धर्मों में मानवता के अलावा कुछ गूढ़ आध्यात्मिक अनुभव होते हैं। अपना-अपना अनुभव छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि को भी जो अनुभव है, उसे सुनकर अपनी पुष्टि करनी चाहिए। आध्यात्मिक अनुभवों का अदान-प्रदान होना चाहिए।
किसी मनुष्य को उपासना का अध्ययन, उसका अनुभव और लाभ लेने से रोकना गलत है। हम यह नहीं कह सकेंगे कि तुम एक दफा तय कर लो कि तुम्हें राम की या उपासना करनी है या कृष्ण का नाम लेना है, इस्लाम का नाम लेना है या ईसा के पीछे जाना है, और यह तय कर लेने के बाद दूसरे मन्दिर में मत जाओ। ऐसा कहना उपासना को मानवता की अपेक्षा संकुचित करना है। उपासना मानवता से बहुत बड़ी चीज़ है। इस दृष्टि से इस सवाल पर बहुत गहराई से सोचना चाहिए।
यह ठीक है कि जिस उपासना में हम पले, उसका परिणाम हमारे ऊपर रहता है, उसका मिटाना नही चाहिए। पर दूसरी उपासना से लाभ नहीं उठाना, यह बात गलत है। उपासना को संकुचित नहीं बनाना चाहिए। उससे उसमें न्यूनता आ जाती है। उपासनाएँ एक दूसरे के लिए परिपोषक होती हैं।
शंकाराचार्य ने जोड़ने का ही काम किया। वे थे आद्वैत को मानने वाले, पर उन्होंने पंचायतन-पूजा सिखाई। अद्वैत में पंचायतन नहीं आता। लेकिन उन्होंने देखा, उस समय पाँच पंच थे, तो पंचायतान के रूप में सबको एकत्र ला सकते हैं। मानवता होगी तभी ऐसे प्रयत्न हो सरते हैं।
प्रथम हम मानव हैं और मानवता के नाते जो कर्तव्य है, वह हमारा प्रथम कर्तव्य है। उपासना के नाम से जो कर्तव्य आएगा, वह उसके बाद आएगा। दर्शन, सम्प्रदाय आदि से आने वाले कर्तव्य बाद में आते हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक-दूसरे के चर्चों में जाते नहीं। यानी उपासना में भी दर्शन-भेद, सम्प्रदाय-भेद होते हैं। हिन्दुओं में भी रामानुज सम्प्रदाय के लोग शंकर सम्प्रदाय के ग्रन्थ नहीं पड़ते। उनके स्तोत्र अलग होते हैं, इनके अलग होते हैं। मैंने ऐसे भी लोग देखें हैं, जिन्हें शांकर पन्थ की सभी टीकाएँ पढ़ीं हैं, लेकिन रामानुज का गीता भाष्य देखा तक नहीं है। एक से तो मैंने पूछा भी कि रामानुज का भाष्य क्यों नहीं पढ़ा? तो उसने कहा, वे भिन्न सम्प्रदाय के हैं इसलिए नहीं पढ़ा। इस प्रकार कहीं-कहीं दार्शनिक भेदों के कारण और उपासना भेदों के कारण भी भेद आता है। यह भेद एक ओर रखकर, मानवता को न खोते हुए उपासना करनी चाहिए।
उपासना यानी मानवता प्लस (अधिक) कुछ होना चाहिए। उपासना यानी मानवता मायनस (कम) कुछ, ऐसा नहीं होना चाहिए। आजकल ऐसा होता है कि हिन्दू मानवता से कुछ कम, मुसलमान यानी मानवता से कुछ कम; लेकिन होना यह चाहिए कि मानवता प्लस कुछ यानी हिन्दू, मानवता प्लस कुछ यानी मुसलमान, मानवता प्लस कुछ यानी ईसाई। ऐसा होता तब उपासना-भेद, दार्शनिक-भेद रहेंगे परन्तु वे गौण होंगे। रीति-रिवाज़ों के भेद तो बिल्कुल स्थुल गिने जाएँगे। इसलिए वे गौण माने जाएँगे। कुरान में पैगम्बर साहब ने कहा है, आप प्रार्थना के समय इस दिशा की ओर मुँह करते हो या उस दिशा की ओर, इसका ईश्वर की उपासना से कोई सम्बन्ध नहीं, धार्मिकता यानी सच्चाई, ईश्वर भक्ति। कुरान के इस वचन के बावजूद, दिशा के बारे में उनका विशेष आग्रह है। ये सब रस्म-रिवाज़ गौण हैं और वे जाने चाहिए। लेकिन उपासना-भेद और दार्शनिक-भेद, जो वैचारिक चिन्तन के विषय हैं, वे सब इकट्ठा कर एक परिपूर्ण दर्शन बनाया जा सकता है। इसलिए धर्म के मानी होने चाहिए मानवता प्लस और कुछ। मानवता कम पड़ेगी तो एक भी धर्म टिकेगा नहीं। हिन्दुस्तान के हम सब लोगों को - हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि जो मानवता को मानते हैं उन सब लोगों को यह भूमिका लेनी चाहिए कि हम सब एक हैं। और यह मानकर कि हम सब एक हैं, परस्पर विचार-विनिमय, चर्चा करनी चाहिए। एक-दूसरे के विचार सुन लेने चाहिए, यहाँ सब वाद खत्म होते हैं, ऐसा हितकर संवाद हम चलाएँ। आज कम से कम इतना होने कि मानवता को मानने वाले हम सब एक हैं।

Tuesday, December 23, 2014

आओ हम इतिहास बनाएँ...


आज अचानक की मुझे ये गीत मिला - आओ हम इतिहास बनाएँ। तो कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। जब मैं वर्धा गया (1991-92) तो अखिल भाई से मुलाकात हुई। एक खुशमिजाज़, तटस्थ और मस्त इन्सान। किसी सूफी फकीर जैसे। वे लिखते और गाते भी खूब थे।
हमें जब भी गाँधी को समझने में कोई दिक्कत होती, हम उनके पास जाते। वे एक दोस्त और मार्गदर्शक थे। उनकी उम्र मुझसे कम से कम 50 साल ज़्यादा रही होगी। लेकिन हमारी दोस्ती में वो रुाकवट नहीं थी।
वे बचपन से बुनियादी तालीम से जुडे रहे, वर्धा में बुनियादी शिक्षण प्रशिक्षण लिया और शायद दिया भी। कुछ समय इन्दौर के पास माचला गाँव में भी रहे। सेवाग्राम आश्रम में भी कई बरस अपनी सेवाएँ दीं। उनकी कोई तस्वीर मेरे पास नहीं, पर उनका खुशनुमा चेहरा मेरी आँखों के सामने है।
 गीत सुनने के लिए इस लिंक पर यहाँ क्लिक करे -


Saturday, May 11, 2013

लिक्विड सोप

बात कल शाम की है।
जैसे ही मैं अपने ऑफिस के पेशाबघर में दाखिल हुआतो अन्दर दो लड़कों को हड़बड़ाट में पाया। दोनों की उम्र तकरीबन 12-13 साल की होगी। मेरे दरवाज़ा खोलते ही  एक लड़का जो उम्र और कद में कुछ छोटा था अपनी फटी हुई सी पतलून में कुछ छिपाता हुआ घूम गया और उसकी पीठ मेरी ओर हो गई। दूसरा लड़का अचकचा कर पेशाब करने की जगह पर चढ़ गया और पेशाब करने लगा। मुझे कुछ अजीब सा लगा। लेकिन उस वक्त मैं कुछ सोच नही सका और उनसे सिर्फ इतना पूछा - "क्या बात है?”

कोई बात नहीं।” कह कर वे दोनों दरवाज़े से रफा-दफा हो गए।

मुझे लगा कि समलैंगिक सम्बन्ध बनाने के लिए तो ये छोटे हैं। किसी लगभग सार्वजनिक पेशाबघर जैसी जग पर इस उम्र के लड़के शायद ऐसा साहस कर भी नहीं सकते। मैंने खुद को समझाईश दी और फारिग होकर हाथ धोने के लिए नल की टोटी को मरोड़ा। तभी नज़र उस सूनी जगह पर गई जहाँ हाल ही में लिक्विड सोप का शीशी रखवाई गई थी।

बाज़ार में तमाम कम्पनियों के लिक्विड सोप आ गए हैं। उसकी शीशी के सिर पर एक फव्वरा सा लगा होता है। दबाते ही तरल साबुन की दो-चार मोटी खुशबूदार बूँदें हथेली पर उतर आती हैं। जब से ये बाज़ार में आईं है तब से अचानक ही साबुन की टिकिया गन्दी और इस्तेमाल की हुई लगने लगी है। यही वजह है कि हमारे ऑफिस के लोगों ने खुद को साफ-सुथरा और तरक्कीपसन्द बनाए रखने के लिए सभी माकूल जगहों पर लिक्विड सोप की शीशियाँ रखवाईं है।

समझने में मुझे देर नहीं लगी कि उन्होंने लिक्विड सोप पर अपना हाथ साफ किया है।

एक बार तो मुझे बुरा लगा कि बच्चे बड़े बदमाश है, चोर हैं। उनका यहाँ लाइब्रेरी में आना बन्द कर देना चाहिए... संस्था को नुकसान पहुँचाते हैं... किताबें भी चुरा कर ले जाते हैं...

लेकिन दूसरे ही पल अच्छा लगा कि साबुन ही तो चुराया है... शायद इस हसरत से कि आमीर लोग जैसे खुद को साफ रखते हैं, वैसे ही हम भी खुद को साफ रखेंगे... हाथ, मुँह... सब कुछ। हो सकता है कि वो शीशी और उसमे लगा फव्वारा उनके हैरानी का सबब हो। वे खोल-खाल कर उसकी पड़ताल करना चाहते हों कि दबाने भर से साबुन बाहर कैसे आ जाता है?

जो भी हो मुझे दुख नहीं। किताब चुराने या न लौटाने पर भी तो हम उन्हें ज़्यादा कुछ नहीं कहते।

लेकिन फिर भी एक सवाल परेशान किए हुए है - कहीं हम चोरी के चस्के को लत में बदले का बढ़ावा तो नहीं दे रहे?

Thursday, December 22, 2011

जीवन शिक्षा... जो मुझे मिली

७ जनवरी को हमारी माई, यानी प्रवीणा देसाई अपनी उम्र के ७५ वर्ष पूरे कर रही हैं।
इस मौके पर कुछ लिखने के लिए निलयम् के साथी किशोर ने मुझे बार-बार कहा।
जो लिखा वह आपके साथ भी साझा कर रहा हूँ। 
  - अमित -
 
इन्दौर की बात है... ठीक-ठीक कहूँ तो इन्दौर शहर के पास स्थित कस्तूरबाग्राम की बात है। मैं वहीं रहता था अपनी माँ और बहन के साथ। कम उम्र में जीवन के कुछ कटु और कठोर अनुभवों से गुज़रा था, इसलिए अपने समवयस्कों से कुछ अधिक अनुभवी था। शिक्षा के नाम पर पुस्तकीय ज्ञान से उपजी बौद्धिक समझ के साथ-साथ दुनिया और दुनियादारी के प्रति अपना एक निजी नज़रिया भी था - भले ही वह गलत रहा हो। शायद इस वजह से व्यक्तित्व में कुछ खिलन्दडपन, बेबाकी और ज़ुर्रत भी शामिल हो गई थी।
माई से मेरी मुलाकात अनायास हुई। कस्तूरबाग्राम में कोई शिविर था। कॉलेज की छात्राएँ उसमे शामिल थीं। हम कुछ दोस्त भी जाकर उनके पीछे बैठ गए। मस्ती और मज़ा। पीछे बैठकर छेड़खानी, मज़ाक और मस्ती चलती रही। पर ज़्यादा देर तक वहाँ बैठे रहने के लिए ज़रूरी था कि शिविर के मंच से चल रही चर्चा को सुना जाए ताकि लोग हमें भी शिविर में शामिल मानें।


सामने छोटे कद की एक महिला बैठी थी। उन्होंने खादी की सफेद साडी पहन रखी थी जो कस्तूरबाग्राम में उस तरह के शिविरों में आने वाली अमूमन हर महिला पहना करती थी। उनका चेहरा भी साधारण था, आवाज़ कुछ असाधाण और तीखी थी, मगर उसमें तेज था... उस आवाज़ में बाँध लेने वाली कशिश थी। मेरा ध्यान उनकी बातों की तरफ गया। वे भारतीय संस्कृति का गुणगान कर रही थीं। अपनी धाक जमाने के लिए या लोग (याने कॉलेज की लड़िकयाँ) मुझ पर ध्यान दें इसलिए या शायद बहस की आदत की वजह से या फिर शायद अनायास किसी अज्ञात की प्रेरणा से... आज कह नहीं सकता कि इनमें से कौन-सा कारक

हावी था या शायद ये सभी बातें मिलजुल गई थीं, मैने बोलने के लिए हाथ उठाया और बारी आने पर भारतीय संस्कृति का महत्ता पर कटाक्ष करते हुए मंच पर बैठी महिला से बहस करने लगा। मैं मानता हूँ कि मेरा दिमाग औसत से कुछ तेज़ था (शायद अब उतना तेज नहीं रहा) और किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों को रोज़ना पढ़ा करता था... मतलब बहस को लम्बा खींचने का दक्षता मुझे हासिल थी। कुछ देर तो यह चलते रहा, फिर उस महिला ने वही तरीका अपनाया जो ऐसे मौकों पर बहुदा आज़माया जाता है - "ठीक है, अपन शाम को अलग से बात करेंगे।" उनकी बात मैंने पकड़ ली और शाम की प्रार्थाना के बाद मिलना तय करके बाहर निकल आया।
वहाँ शाम पाँच बजे सामूहिक प्रार्थना हुआ करती थी। हमारे लिए वो दिन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता था। सारी लड़कियाँ होस्टल से चलकर प्रार्थना हॉल तक जातीं और तकरीबन आधे घण्टे बाद वापस होस्टल को लौटतीं। हमारी प्रिय जगह होती पुलिया! वहाँ बैठकर सारे दोस्त गपबाजी करते और एक बार उन्हें इधर से उधर और फिर उधर से इधर जाते देखते। कभी हम उनकी विपरीत दिशा में टहलते हुए जाते। कभी मैदान पर क्रिकेट खेल रहे होते तो ठीक उसी समय गेन्द खोजने के बहाने सड़क पर आ जाते।
अपना ये नित्यकर्म पूरा करके मैं नियत समय पर उस महिला के पास पहुँच गया। शायद वे भी तैयार थीं। मेरे साथ मेरे कुछ दोस्त भी थे और बाहर से आए कुछ शिविरार्थी भी इस समूह में गोल घेरा बना कर बैठ गए। मैं भारतीय संस्कृति का निपटारा करने की फिराक में गया था, लेकिन वह महिला अलग ही धरातल पर थी। अपनेपन से बातें की। मुझसे अपने और परिवार के बारे में पूछा। फिर उन्होंने बताया कि वर्धा में युवाओं के लिए एक केन्द्र है, वहाँ कुछ युवक रहते और देश-दुनिया के बारे में अध्ययन करते हैं। मुझे वहाँ आने का आमंत्रण दिया। बातचीत खत्म होते समय हमने एक-दूसरे का पता भी लिया-दिया। पते से पता चला कि उनका नाम प्रविणा देसाई है और पवनार आश्रम में रहती हैं।
मैंने महसूस किया कि अब तक जितने गाँधीवादियों से मेरा समना हुआ है, उनसे वे कुछ अलग हैं। उनके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ है जो मुझे आकर्षित कर रहा था। मैंने उन्हें पत्र लिखा। उसमें भी कुछ सवाल, कुछ आशंकाएँ.. याने बहस का पर्याप्त मसाला था! कुछ दिनों बाद उनका जवाब आया। अपेक्षा के विपरीत अपनेपन से भरा। बहस को टाल कर उन्होंने मुझे वर्धा स्थित युवा केन्द्र 'निवेदिता निलयम्' में आकर रहने को कहा। फिर मैंने खत लिखा... उनका जवाब आया। यह सिलसिला तकरीबन एक साल चला।
आखिर मैंने इरादा मजबूत किया और निवेदिता निलयम् पहुँच गया। वहाँ राम भाई, अक्षय, राजा, गजानन्द वगैराह साथी मिले। मन रम गया। खूब पढ़ा, बहस की, खेत में काम किया, गड्ढे खोदे, खूब मूँगफलियाँ खाई और छक कर दूध पिया... इन सब ने मिलकर हमारे व्यक्तित्व को एक साझा आकार दिया।
उस वक्त निलयम् के संचालन की कमान राम भाई के हाथ में थी। माई के पास पवनार जाकर सीखने के सभी के दिन तय थे - रामभाई बृहस्पति, गजानन्द सोमवार.... मैंने भी कोई दिन तय कर लिया। पर नियमित जाना होता नहीं था। डायरी लिखता, मगर वह भी अनियमित। फिर भी पढ़कर माई तारीफ करती थी। माई के पास सब गीता सीखने जाते। गीता माई के श्वास में बसती है... शायद इसी लिए निलयम् की हवा में भी गीता समाई हुई है... और शायद यही वजह है कि मैंने माई के पास बैठकर कभी गीता नहीं सीखी... जो सहज उपलब्ध हो उसे सायास क्या सीखना...? ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई... मैंने यह घोषणा ज़रूर कर दी थी कि मुझे तीसरे अध्याय का पैंतीसवाँ और चौथे अध्याय का चालिसवाँ श्लोक पसन्द आया।
मैंने और लोगों की तरह उनके साथ बैठकर नहीं सीखा, मगर उनकी उपस्थिति में, उनके सानिध्य से, उन्हें देख कर बहुत कुछ सीखा। आज मैं जो कुछ हूँ, वह माई की वजह से हूँ। माई से मुझे जीवन दृष्टि मिली, मैंने जीवन का अर्थ उन्ही से सीखा। जीवन में मैंने ज्ञान का जो थोड़ा-सा रस चखा है वह भी माई के ही आशीर्वीद का फल है।
मैं जानता हूँ कि माई मुझसे खुश नहीं हैं। मैं उनके सपनों को पूरा नहीं कर पाया, उनकी कसौटी पर खरा नहीं उतरा, उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं किया। मगर जैसा भी हूँ उनका बेटा हूँ और मुझे गर्व है कि मैंने अपने जीवन का एक अरसा प्रविणा देसाई के सानिध्य में गुजारा है।
कामना करता हूँ कि वे शतायू हों और उनका आशीर्वाद सदैव हमारे साथ रहे।
शुभकामना

Wednesday, December 22, 2010

साक्षात्कार

- अमित


(यह कहानी उस एकलव्य को समर्पित है, जिसने अकादमिक िशक्षण को नकार कर खुद की योग्यता साबित की थी।)


सायास मुस्कुराते हुए उसने नमस्ते कहा और कमरे में प्रवेश किया। सामने बैठे पाँच में से तीन को वो जानता था। निदेशक ने बाकी दो सज्जनों का नाम बताते हुए उसे अपना परिचय देने को कहा।
“जी, मैं इन्दौर का रहने वाला हूँ, यहाँ-वहाँ घूमने का शौक है इसलिए पूरा देश घूमा हूँ, पिछले तीन साल से ज्यादा समय से आपकी संस्था में लाईब्रेरी का काम कर रहा हूँ।''
“कर रहा हूँ" कहने में उसे संकोच हुआ, मगर कुछ और कहते न बना। परिचय के नाम पर क्या कहा जाए, उसे कभी समझ नहीं आया। उसकी जिन्दगी इतनी उलझन भरी रही है, इतने मोड़ों से ग़ुज़री है कि उन सब को गिनते हुए परिचय के रूप में उगलना उसे कभी गवारा नहीं हुआ। क्या मेरा नाम और सामने बैठा मैं ख़ुद परिचय के रूप में काफी नहीं? सवालों का सामना करने की तैयारी करते हुए उसने अपनी पीठ सीधी करने के लिए पहलू बदला।
“यहाँ काम करते हुए आपको क्या-क्या दिक्कतें हुई?'' निदेशक का सवाल।
खुद को नकारात्मक बातों से दूर रखते हुए उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया - “जी वो दिक्कत तो कुछ नहीं... सब ठीक था, सीखने के मौके थे सब। ...ठीक था।''
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एक प्रतिष्ठित एन.जी.ओ में लाइब्रेरियन का साक्षात्कार चल रहा है। सामने संस्था के निदेशक समेत पाँच विद्वान उसकी क्षमता को ठोक-बजा कर जाँच रहे हैं।
“अच्छा, तो आपने यहाँ क्या-क्या किया वो बताओ।'' निदेशक ने शायद अपने आप को दुरुस्त किया।
सब तो सी.वी में लिखकर दे रखा है। ये फालतू औपचारिकता निभा रहे हैं। पूछा है तो कुछ कहने के लिए उसने कहा, “जी, वो होशंगाबाद, भोपाल, इन्दौर में कम्प्यूटराईजेशन, क्लासिफिकेशन.... जी हमने खुद का क्लासिफिकेशन बनाया... फिर लाईब्रेरी के रूटीन काम....'' लगा कोई सुन नहीं रहा है। उसने ज़बान की लगाम थाम ली।
सामने दाएँ कोने से आवाज़ आई, “आपने लिखा है कि आपको पढ़ने में रुचि है, क्या-क्या पढ़ते हैं ?''
क्या जवाब दे, वह सोचने लगा कौन-कौन सी किताबों के नाम गिनाए? “कुछ किताबें, पत्रिकाएँ वगैराह, ई.पी.डब्ल्यू...''
फिर बिना रुके आवाज़ आई, "अभी आपने सेमिनार का कोई लेख पढ़ा हो तो उसका एब्स्ट्रेक्ट बताओ।''
उसके कानों को महसूस हुआ कि 'एब्स्ट्रेक्ट' पर कुछ ज़्यादा वज़न दिया गया है। उस आवाज़ में से तम्बाखू की सी बदबू भी महकी।
सेमिनार पढ़ना उसे कभी रुचिकर नहीं लगा, भारी-भरकम वाक्य और बेमतलब की लाग-लपेट। बुध्दिजीवियों की जुगाली। उसे कहना पड़ा “जी, सेमिनार तो काफी दिनों से नहीं पढ़ा।''
निदेशक ने राह दिखाई - “तो, ई.पी.डब्ल्यू. का बताओ''
कुँए से निकाल कर खाई में ला पटका। जवाब देने को वो मजबूर था। बांग्लादेश के महिला बचत समूहों के बारे में छपा एक लेख उसे याद आ गया। स्कूली बच्चे की तरह उस लेख का सार कहते हुए वह सोचने लगा कि कहीं लेखक का नाम-पता ना पूछ बैठें। उसका कहना खत्म हआ। एक बार फिर उसे लगा कि कोई सुन नही रहा।
दाएँ कोने से फिर आवाज़ आई, “एब्स्ट्रेक्ट का मतलब क्या होता है, जानते हैं?''
उसे समझ नहीं आया कि यह पीछे क्यों पड़ गया है? और इस सब का लाईब्रेरी के काम से क्या वास्ता? जवाब तो देना ही था, “जी, किसी लेख का सार। एब्स्ट्रेक्ट याने लेखक जो कहना चाहता है, ...जो कहने के लिए उसने लेख लिखा है वो... आठ-दस पंक्तियों में उसे पेश करना...'' अपनी सहज विनम्रता से उसने जवाब दिया।
“बस, आठ-दस लाईनें?'' दाएँ कोने ने पुष्टि करनी चाही।
“जी, मेरे खयाल से इतना काफी है। इससे ज़्यादा लिखेंगे तो आपको एक लेख ही लिखना पड़ेगा।'' सामने दाँए कोने वाले से नज़रें मिलाते हुए उसने जवाब दिया। जवाब देते हुए उसने 'आपको' पर कुछ ज्यादा ही जोर दे दिया था।
“एपिस्टोमोलॉजी के बारे में आप क्या जानते हैं?'' दाँए कोने वाले ने उसकी बखिया उधेड़नी शुरू की।
वो चक्कर में पड़ गया। उसकी छटी इन्द्रीय ने इशारा किया कि पिछला जवाब, या शायद जवाब की शैली दाएँ कोने में कहीं चुभ गई है। उसी की टीस 'एपिस्टोमोलॉजी' के रूप में मुखर हुई है।
“जी, माफ कीजिए, नहीं जानता।'' बेचारगी से वह इतना ही कह पाया।
“लाइब्रेरी साइंस में तो इसका काफी उपयोग होता है।''
“जी, मैंने इस बारे में कुछ नहीं पढ़ा।''
साक्षात्कार कक्ष में कुछ पल चुप्पी छा गई। वह दिमाग पर ज़ोर डाल कर सोच रहा था कि 'एपिस्टोमोलॉजी' के बारे में उसे कुछ सूझ जाए। कोशिश बेकार। कभी पढ़ा ही नहीं था। हार कर उसने पहलू बदला, अपनी पीठ को कुछ आराम दिया और सामने देख कर अगले सवाल का इन्तज़ार करने लगा।
दायाँ कोना फिर गूंजा, “स्टीफन हॉकिन्स के बारे में आप क्या जानते हैं?
सवाल सुनकर उसका आत्मविश्वास लौट आया। मुस्कुराते हुए उसने मुँह खोला, “जी उनकी किताब ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाईम लाइब्रेरी में है। ...उन्होंने आइंस्टाइन से आगे की कोई बात कही है...'' उसके शब्द उसे अन्धे कुँए में गूँजते सुनाई दिए।'' वह कुछ और कहना चाहता था, मगर सुनने वालों के भावहीन चेहरे पढ़ कर उसने चुप होना ही उचित समझा।
तत्काल निदेशक महोदय ने कहा, “टाईम, याने हिस्ट्री की बात करने वाले वो इतिहासकार हैं या...''
वह ताड़ गया, “जी, वो फिजि़क्स, मॉर्डन फिजि़क्स के हैं...'' एक साँस में कह तो गया, मगर यह न समझ पाया कि सवाल का आशय केवल यही जानना था कि स्टीफन हॉकिन्स किस विषय के विद्वान है? यह तो सबको पता है कि वे मॉर्डन फिजि़क्स के अग्रदूत हैं। उसने सोचा था कि स्टीफन हॉकिन्स द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्तों के बारे में पूछा जा रहा है।
लेकिन यह बकवास पूछी क्यों जा रही है। अपने सी.वी. में वो साफ लिख चुका है कि उसके पास कोई डिग्री-डिप्लोमा नहीं है, वह उनमें विश्वास नहीं करता, जाति की ही तरह डिग्री-डिप्लोमा भी व्यक्ति की योग्यता को नापने के ग़लत पैमाने हैं। और ये संस्था, साक्षात्कार में जिसके कर्ता-धर्ताओं का वो जैसे-तैसे सामना कर रहा है, वे भी तो अपने शोधों-प्रयोगों के माध्यम से योग्यता के प्रचलित मूल्यांकन की पध्दति पर सवाल उठाते रहते हैं। आखिर ये मुझसे चाहते क्या हैं?
“ई.पी.डब्ल्यू. में लगातार लिखने वाले पाँच लेखकों के नाम बताओ।'' दाएँ कोने वाला उसे धराशायी करने पर तुला हुआ था।
वह कहना चाहता था कि मैं तो उसे लगातार पढ़ने वाला बन्दा नहीं हूँ, लिखने वालों के नाम मैं क्या जानूँ? मुझे तो आपका नाम सुनने के बाद अगले पल तक भी याद नही रहा। नाम में रखा क्या है, तुम साला काम देखो। आवेग को दबाते हुए उसने एक जाना-माना नाम लिया और चुप हो गया। इसके बाद वह दाएँ कोने वाले को यह कहने के लिए माक़ूल मौके का इन्तज़ार करने लगा कि कभी आप जरा उन लाईब्रेरियों में तशरीफ लाएँ, जिन्हें किताबों के बेतरतीब ढ़ेर में से मैंने खड़ा किया और चलाया है। इस नौकरी के लिए इतनी योग्यता पर्याप्त है। बाकी बकवास बन्द करो!
अब वह पूरी तरह परेशान हो चुका था।
“सोशल साइंस के पाँच प्रमुख जर्नलों के नाम बताओ।'' बीच में बेठै मोटे दढ़ियल ने मोर्चा सम्भालते हुए सवाल दाग़ा।
“जी, संस्था की लाइब्रेरी में आते हैं वो, या वैसे ही...''
“नहीं, जो भी हैं, आप नाम बताओ!''
“जी, वो ई. पी. इब्ल्यू., सेमिनार, एक वो आई.ई.एस.एच.आर., और एक वो इतिहास का भी है... वो नाम याद नहीं आ रहा...''
पिछले सात महीनों से वह बेरोज़गार है। यह बेरोज़गारी अवसाद बन कर उसके व्यक्तित्व में समा गई है। हँसी मुरझा गई है। रचनात्मकता की लौ बुझ गयी है। पिछले हफ्ते बेटे के जन्मदिन पर तोहफे का वादा पूरा न कर पाने का त्रास उसके दिमाग पर अब तक छाया हुआ है। इस नौकरी को पाने की चाहत में यहाँ तक आया है और इन अप्रासंगिक सवालों को झेल रहा है। हालाँकि वो जानता है कि ठेके पर काम करते हुए पिछले तीन सालों में इसी संस्था की लाईब्रेरी वो अच्छे से खड़ी कर चुका है, अब स्थायी कर्मचारी के रूप में उसे चलाने वाला भी वही सबसे बेहतर उम्मीदवार है। उसकी योग्यता इसी संस्था में साबित हो चुकी है।
“आपने करंट साइंस का नाम नहीं लिया, वो भी तो है।'' सामने दाएँ कोने से उसे सूचना मिली।
ये मुझे बुध्दू साबित करने पर क्यों तुला है? वह हड़बड़ा गया। सोचने लगा, करंट साइंस में तो विज्ञान के लेख ज्यादा आते हैं ना? वह कुछ कहने को हुआ, मगर ज़बान ने उसका साथ नहीं दिया। सामने चमचमाते स्टील के गिलास को उठा कर उसने दो घूँट पानी हलक में उण्डेला, तभी उसे शून्य में से आवाज़ आती सुनाई दी -
“ठीक है, विज्ञान के?''
उसी शून्य में उसने अपनी नज़र गडाने की कोशिश की। सामने कोई चेहरा, कोई आकार नज़र नहीं आ रहा था। कहीं पढ़ा था कि साक्षात्कार के समय सामने वाले से आँखें मिला कर बात करनी चाहिए। इससे आत्मविश्वास झलकता है। इसलिए, आत्मविश्वास झलकाने का दु:साध्य श्रम करते हुए उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया। मगर सामने अँधेरा था। तत्काल उसने मन नही मन अँधेरे की एक मानव-मूर्ति गढ़ ली और उस मूर्ति की सम्भावित आँखों में झाँकते हुए उसने कहना शुरू किया - “जी, डाउन टू अर्थ, वो तो पर्यावरण का है, एक करंट साइंस, एक हिन्दी का विज्ञान प्रगति...'' उंगलियों पर गिनते हुए उसने उस संस्था द्वारा प्रकाशित पत्रिका का भी नाम लिया और सहसा याद करते हुए उसने जोड़ा “...वो एक सलीम अली वाले ग्रुप का है मुम्बई से निकलता है... उसका नाम याद नहीं आ रहा..'' वह जान गया कि अवसाद उसकी स्मृति का काफी हिस्सा लील गया है।
सामने बीच में बैठा मोटा दढ़ियल बुदबुदाया, “बी.एन.एच.एस.?''
“जी, वही।'' उसने राहत की साँस लेते हुए कहा।
मगर हार मानने से पहले आखरी कोशिश कोशिश के रूप में उसने अस्त-व्यस्त होकर अवसाद से लिपटी अपनी स्मृति को व्यवस्थित करने के लिए दिमाग को तेज़ी से खंगालना शुरू किया। मनुष्यों के चेहरे रीते दिये की तरह बुझ गये। उसके स्थान पर स्याह आकृतियाँ हिलती-डुलती नज़र आईं। उसकी स्मृति की सतह पर घटनाएँ तैरने लगीं - वो तैयार हो कर रोज की तरह अख़बारों का पुलिन्दा हाथों में लिए लाईब्रेरी जा रहा है। दरवाज़े के चन्द कदम पहले अन्धेरे में घिरी एक आकृति उसे रोकती है। उसका हाथ स्याह आकृति की जेब से निकला एक सफेद कागज़ थाम लेता है। लगता है वह कागज़ कोरा ही है। नहीं, कुछ काली पंक्तियाँ भी है - काली पंक्तियाँ, उस हिलती-डुलती काली आकृति की तरह। खड़े-खड़े ही वो पढ़ने लगता है - “...संस्था के साथ आपका अनुबन्ध 31 मार्च को समाप्त हो गया है। आपकी सेवाओं की फिलहाल आवष्यकता नहीं है। जरूरत होने पर आपको पुन: अनुबन्धित किया जाएगा....''
उसे याद आता है कि आज 1 अप्रैल है। कहीं अप्रैल फूल तो नहीं बनाया जा रहा। मगर ये स्याह आकृति इंसान नहीं है, केन्द्र प्रभारी है - संस्था का प्रतिनिधि। इंसान मज़ाक करते हैं। संस्था मज़ाक नहीं करती, क्योंकि संस्था में इंसानियत नहीं होती।
“....तो भोपाल में भी ज़रूरत नहीं?'' उसके मुँह से शब्द फिसले।
“नहीं, आपका अनुबन्ध पूरा हुआ।'' स्याह आकृति ने जवाब दिया।
स्मृति के भूल-भूलैया सागर में गोते लगाते हुए वो उस स्याह आकृति का चेहरा याद करने की कोशिश कर रहा है। मगर चेहरे एक-से कहाँ रहते हैं। रंग बदलते रहते हैं, कभी सफेद, कभी ज़र्द, कभी सुर्ख़ तो कभी स्याह। चेहरों के आकार भी तो हमेशा बदलते रहते हैं, कभी फूले कुए कद्दू की तरह, कभी लटकी हुई लौकी की तरह, तो कभी खिले हुए कमल की तरह, कभी-कभी वो बेजान गुलाब की तरह मुरझा भी तो जाते हैं। बुलबुलो की तरह तैरती-बिखरती ज़िन्दगी में रंग-रूप बदलते चेहरों को कोई कितना याद रखे? अपनी स्मृति में उनकी कौन-सी पहचान स्थिर करे?
सवाल उसकी स्मृति में तैर रहे हैं। सवाल हवा में भी तैर रहे हैं। साक्षात्कार जारी है। उससे कुछ सवाल पूछे जा रहे हैं। उसे पता नहीं कि वो जवाब दे रहा है या चुप है। वह तो अपनी स्मृति के बिखरे मोतियों किसी तरह समेट कर व्यवस्थित करने की जद्दोज़हद कर रहा है। उसे पता है कि एक बार स्मृति का ठौर पाते ही वो अवसाद को अपने पर हावी नहीं होने देगा और उसके बाद सभी सवालों के जवाब भी दे पाएगा। उसके बाद ही.....
अभी तो वह अपनी स्मृति में एक उलझी घटना को सुलझाने में व्यस्त है।
स्याह आकृति को वह कह रहा है, “तो, अब मुझे काम करने की ज़रूरत नहीं?''
“नहीं।''
यह आदेश है या आग्रह, उसे समझ नहीं आता।
कागज़ की वह ठीक वैसी ही तह करता है, जैसा उसे दिया गया था। अपनी जेब के हवाले करता है। अख़बारों का पुलिन्दा स्याह आकृति के बढ़े हाथ थाम लेते हैं और अपने आप ही उसके हाथ जेब में चाभी तलाशने लगते हैं।
अन्धेरा छा गया है। उसे याद नहीं आ रहा है कि लाईब्रेरी की चाभी उसकी कौन-सी जेब में रखी थी। चाभी देते वक्त हुआ हाथों का कम्पन अब उसके दिल में महसूस होने लगता है।
साक्षात्कार चल रहा है।
कमीज़ की जेब में टंगी बेकार-सी कलम को व्यवस्थित करने के बहाने वो अपने दिल को सहलाता है, खुद को तसल्ली देते हुए दोहराता है कि वो घटना सात महीने पुरानी है। उसके बाद अब तक वो खुद को काफी तसल्ली दे चुका है। अब वक्त तसल्ली का नहीं, साक्षात्कार का है। मगर वो हार गया है। खुद से। खुद से किया अपना वादा वो नहीं निभा पाया कि आत्मविश्वास कायम रखना है। अवसाद को हावी नहीं होने देना है।
तभी उसे कुछ शब्द सुनाई देते हैं, जो कह रहे हैं कि साक्षात्कार पूरा हुआ। धन्यवाद।
वो सभी की ओर लाचारी भरी मुस्कान उछाल कर लौट जाता है।
बाहर आकर उसे पता चलता है कि लाईब्रेरियन के पद के लिए कोई और उम्मीदवार आया ही नहीं। वही इकलौता उम्मीदवार था। बाहर आकर वह महसूस करता है कि यहाँ थोड़ी-सी रोशनी है।
मगर भीतर कक्ष में उसे अयोग्य साबित किया जा चुका था। जबकि वो जानता है कि वो औसत से अधिक बुध्दिमान, कर्मठ और ईमानदार है। अपनी योग्यता इसी संस्था में वो पहले ही साबित कर चुका है।
घर पहुँचने के लिए वो बस पकड़ता है। करीब ढ़ाई-तीन घण्टे तक बस में बैठा रहता है। बस अन्धेरे में कहीं जा रही है। आँखें बन्द कर वो सोने की कोशिश करता है। उसे महसूस होता है कि बस के रास्ते में काफी उतार-चढ़ाव हैं। वह ध्यान देता है तो उसे महसूस होता है कि उसके रास्ते में उतार ही उतार हैं। उसकी बस अन्धेरी खाई में तेजी से उतरती जा रही है।
घर पहँच कर वो सो जाता है।
अगले दिन शाम को वो ईमेल पढ़ता है। निदेशक ने बड़े अपनेपन से लिखा है - 'अत्यन्त दुख से कहना पड़ रहा है कि पुस्तकालय प्रभारी के रूप में आपका चयन नहीं हुआ है। हम इस पद के लिए पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे।'
कुछ रूक कर वो आगे पढ़ता है - 'आपने संस्था की लाईब्रेरी बनाने में जो मदद की है, उसके लिए हम आपके आभारी हैं।'
उसके सामने कम्प्यूटर के मॉनिटर पर शब्द तैरने लगते है, तैरते हुए शब्दों के सागर में डूबने से पहले वो जल्दी से पढ़ जाता है - 'हम आपके उज्वल भविष्य की कामना करते हैं।'
मॉनिटर की रौशनी पिघल कर बहने लगी है। वह चश्मा उतार कर आँखें मलता है। अवसाद पिघल कर उसकी आँखों से बहने लगा है। उसकी जेब में रुमाल नहीं है। वो आँखों को कुछ देर दबाए रखता है। अवसाद का गुनगुना लावा उसकी उंगलियों को गीला करता हुआ कहीं खो जाता है।
एक बार फिर वो मेल पढ़ने की कोशिश करता है। स्याह लफ्ज़ बर्फ की तरह जम तो गए हैं मगर मॉनिटर पर रोशनी अब झील की तरह स्थिर है। बर्फ की मानिन्द सर्द शब्दों को वह फिर पढ़ता है - 'पुस्तकालय प्रभारी के रूप में आपका चयन नहीं हुआ है। हम इस पद के लिए पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे।' दूसरी बार पढ़ने पर भी शब्द और उनके मायने बदलते नहीं हैं।
'पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे' - उसके मन में कोई दोहराता है।
वो सोच रहा है एक बार फिर आवेदन किया जाए। अब वो तैयारी के साथ साक्षात्कार में जाएगा।
लेकिन इसी संस्था में सबके सामने वो साढ़े तीन साल में तीन केन्द्रों पर लाइब्रेरी बनाने और चलाने की अपनी योग्यता साबित कर चुका है। अब और कौन-सी तैयारी उसे योग्य साबित करेगी?
उसके सामने दो उपाय हैं, एक जो यह कि वो कुछ किताबें पढ़ कर जाए और सवालों के जवाब में किताबें ही उगल दे। शायद साक्षात्कार लेने वाले उससे किताबी बातें ही सुनना चाहते हैं, वह नही जो वह कहना चाहता है; या फिर कुछ और तरह का काम तलाश करे।
'कुछ और तरह का काम' याने क्या ?
पता नही।

सम्पर्क
एकलव्य परिसर
मालाखेडी,
होशंगाबाद ४६१००१
# 0 9424471247
amt1205@gmail.com

Saturday, December 18, 2010

दगडू

बात कुछ पुरानी है। कोल्‍हापुर के पास के जंगलों में रहने वाले दगढू नाम के एक धनगर को रोज़ाना मांस-मच्‍छी खाने की आदत थी। पुणे में आकर बसा तो उसे सदाशि‍व पेठ (ब्राह्मणवादी शहर पुणे का एक घोर ब्राह्मणवादी इलाका) में घर मि‍ला। सेटल होने के बाद दगडू रोज़ अपने घर में मांस पकाता था। उसकी गन्‍ध सारी बि‍ल्‍डिंग पर छा जाती थी। कुछ दि‍नों में सारे पड़ोसी आपस में इसकी चर्चा करने लगे। मगर उस हट्टे-कट्टे दगडू से पंगा कौन ले? अन्‍तत: गोगटे काका ने इसका जि‍म्‍मा लि‍या।

अगले दि‍न सुबह काका ने दगडू से मुलाकात की। काफी देर यहां-वहां की बातें करने के बाद मुद्दे की बात छेड़ी। उनका आशय जान कर दगडू बोला, “पर काका मैं तो बचपन से यही सब खाता आया हूं। मैं जंगल में पला-बढ़ा हूँ, ये आदत कैसे छूटेगी?”

काका बोले, “अरे बेटा, तू पहले अलग सोहबत में था, अब तू असली वि‍द्वानों की संगत में है! क्‍या तुझे इस बात का अहसास है कि‍ तू कि‍तना भाग्‍यवान है?”

बात पर बात बढ़ती गई मगर कोई समाधान नहीं हो सका। अन्‍तत: काका बोले, ”इसका एक ही उपाय है... तुझे शाकाहारी बनना ही होगा।”

वह बोला, ”यह कैसे सम्‍भव है?”

काका ने हाथ में थोड़ा पानी लि‍या, शान्‍ति‍ से ऑंखें बन्‍द कीं, एक लम्‍बी सांस लेकर उन्‍होंने प्रणाम कि‍या और एक बार फि‍र लोटे में से अपने हाथ पर थोड़ा पानी लि‍या।

दगडू भौंचक होकर उन्‍हें देख रहा था।

अपने हाथ का पानी दगडू पर छींट कर वे बोले, ”तूने एक धनगर के रूप में जन्‍म लि‍या था, धनगर के रूप में पला-बढ़ा, कि‍न्‍तु अब तू एक ब्राह्मण है।”

अत्‍यन्‍त भावुक होकर दगडू ने उनके चरण पकड़ लि‍ए। काका ने भी तहेदि‍ल से उसे आर्शीवाद दि‍या और सोसायटी कष्‍टमुक्‍त हो गई यह मान कर गोगटे काका ने राहत की सांस ली।

शाम को जोशीजी ने गोगटे काका को बताया कि‍ उन्‍होने दुकान से दगडू को मुर्गी का मांस लाते हुए देखा था। तमतमाए हुए काका जोशीजी को साथ लेकर दगडू के घर पहुँचे तो देखते हैं कि‍ दगडू उनकी ओर पीठ कि‍ए बैठा है और उसके सामने एक साफ-सुथरी थाली में धुली हुई बोटि‍यां रखी हैं।

काका कुछ बोलते... तभी दगडू ने अपने हाथ में पानी लि‍या और थाली पर छि‍डक कर वह बोला, ”तूने मुर्गी के रूप में जन्‍म लि‍या, और मुर्गी के रूप में ही पली-बढ़ी, मगर अब तू चवला फली है!”

***

Friday, November 26, 2010

सेवाग्राम आश्रम में सात दिन

गाँधीजी सारी दुनिया के लिए एक आदर्श हैं। आज अनेक लोग यह जानना-समझना चाहते हैं कि सत्य और अहिंसा जैसे शाश्वत मूल्यों से उपजी आध्यात्मिक प्रेरणा के बल पर कैसे उन्होंने हज़ारों-लाखों लोगों को आन्दोलित किया, साम्राज्यवाद के खिलाफ एक राजनीतिक संघर्ष का नेतृत्व किया, उसे दिशा दी और सफल बनाया। व्यक्ति, समाज, पर्यावरण, राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, मानवीय सम्बन्ध, अध्यात्म... मनुष्य जीवन का शायद ऐसा कोई पहलू नहीं, जिसपर उन्होंने विचार न किया हो। उनका जीवन हमें एक पूर्ण मनुष्य के रूप में समग्र जीवन जीने की प्रेरणा देता है। अनेक लोग चाहते हैं कि वे गाँधी विचार के सानिध्य में कुछ समय बिताएँ, उसे नज़दीक से जानें-समझें और उन मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें जिन्हें गाँधीजी ने अपनाया था। यह एक व्यक्ति के रूप में हमें गुणात्मक रूप से एक बेहतर जीवन जीने का अवसर तो प्रदान करेगा ही, साथ ही साथ यह हमें समाज-जीवन की विविध समस्याओं को समझने और उनके समाधान के प्रयास करने की भी प्रेरणा देगा।
सेवाग्राम आश्रम
सेवाग्राम आश्रम गाँधीजी की कर्मस्थली रही है। 1936 में वर्धा (महाराष्ट्र) के निकट गाँधीजी ने सेवाग्राम आश्रम स्थापित किया। आज एकमात्र यही स्थान बचा है जहाँ गाँधीजी के जीवन-मूल्यों के आधार पर 'आश्रम जीवन' कायम है। जैविक खेती, गौशाला, चरखे पर सामूहिक कताई, प्रार्थना जैसी नियमित गतिविधियों के साथ यहाँ आश्रम जीवन चलता है। साथ ही, आश्रम में रहने वाले साधक स्थानीय उत्पादन के आधार पर स्वावलम्बन का प्रयोग भी कर रहे हैं। यहाँ आप ग्रामोद्योग आधारित सादगीपूर्ण स्वावलम्बी जीवन का अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। साथ ही, आश्रम में देश-विदेश में चलने वाली विविध गतिविधियों पर संवाद भी होता है।
आश्रम में सात दिन
जो भी व्यक्ति गाँधी विचार के सानिध्य में आश्रम जीवन जीते हुए जीवन और समाज से जुड़ी समस्याओं पर विचार करना चाहता है उसका स्वागत है। यह सानिध्य एक अध्ययन शिविर के रूप में होगा, जिसकी दिनचर्या नियत होगी। अनुभवी व्यक्तियों के मागदर्शन, अध्ययन सामग्री तथा मुक्त चर्चा के रूप में हम अध्ययन करेंगे। साथ ही हम आश्रम दिनचर्या का भी हिस्सा बनेंगे, जिसमें सामूहिक सफाई, श्रमकार्य और प्रार्थना शामिल है। इन सात दिनों में हम जीवन-मूल्य, शिक्षा, आर्थिक प्रश्न आदि विषयों पर केन्द्रित अध्ययन करेंगे। यह अध्ययन मूलत: जिज्ञासु छात्रों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और खोजी युवाओं की अपेक्षाओं को ध्यान में रख कर किया जाएगा। प्रयास रहेगा कि इस शिविर के माध्यम से व्यक्ति, समाज और प्रकृति के प्रति समझ स्पष्ट हो और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र के लिए यह उपयोगी हो। इससे आगे, अधिक गहन अध्ययन की जिज्ञासा जगाना भी इसका एक उद्देश्य है। प्रत्येक वर्ष में सात दिनों के चार शिविर होंगे। इस श्रृंखला में पहला शिविर 2 से 9 फरवरी 2011 को होगा।
अपेक्षा
शिविर में लगभग 20 व्यक्तियों के लिए स्थान है। यह शिविर सभी के लिए खुला है। इसमें संवाद का माध्यम हिन्दी होगा, मगर पठन-सामग्री हिन्दी, मराठी, गुजराती, अग्रेज़ी आदि भाषाओं में हो सकती है। आपसे अपेक्षा की जाती है कि शिविर के लिए आवेदन करने से पूर्व अपनी तैयारी जाँच लें कि आप इतना कर सकें -
* रोज़ाना लगभग 6-7 घण्टे शिक्षण-सत्र।
* रोज़ाना लगभग 10-15 पन्नों की लिखित सामग्री का अध्ययन व उस पर चर्चा।
* आश्रम दिनचर्या का पालन, जिसमें प्रार्थना, सफाई व श्रम कार्य शामिल है।
* व्यसनों का त्याग।
* सादा भोजन।
औपचारिक रूप से शिविर सात दिनों का ही है किन्तु यदि आप शिविर समाप्ति के बाद आश्रम जीवन का अनुभव लेने के लिए तथा मुक्त रूप से अध्ययन करने के लिए सेवाग्राम में कुछ अधिक समय रुकना चाहें तो आपका स्वागत है।
सम्पर्क
इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह शिविर आपके जीवन का एक अनमोल अनुभव सिध्द होगा। यदि आपको इसके विषय में और अधिक जानकारी चाहिए हो तो कृपया शिविर आयोन समिति के अधोहस्ताक्षरकर्ता साथियों से सम्पर्क करे। शिविर में शामिल होने लिए कृपया अपना परिचय इनमें से किसी एक पते पर भेजें –
(1) विनोद स्वरूप
मंत्री, सेवाग्राम आश्रम प्रतिष्ठान
सेवाग्राम 442102
वर्धा (महाराष्ट्र)
फोन - 07152-284753 (कार्यालय)
(2) अमित
एकलव्य परिसर
मालाखेडी,
होशंगाबाद 461002
मध्य प्रदेश
amt1205@gmail.com

आपका पत्र मिलने के बाद हम उस पर विचार करेंगे और आपको सूचित करेंगे।

विनीत

अमित
(+919424471247)

अविनाश काकडे
(+919730216700)

आनन्द योगी
(+9197652098452,+919404217198)

मालती देशमुख
(+919420465597)

विनोद स्वारूप
(+919422003690)

सत्यप्रकाश भारत
(+919990627909)


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Thursday, June 3, 2010

वो पागल लड़की

ना जाने क्यों
हवा में
मुस्कान बिखेर देती है

ना जाने क्यों
अपलक देखती रहती है
अदृश्य आकृतियाँ
आसमान में

ना जाने क्यों
खींचती है आड़ी-तिरछी लकीरें
कागज़ पर, मेज़ पर
या अपनी हथेली पर

ना जाने क्यों
सिर झुका कर
वो कुछ सोचने लगती है
अचानक ही

ना जाने क्यों
कुछ ज्यादा ही
खुश नज़र आती है
वो इन दिनों

ना जाने क्यों
वो पागल लड़की
प्यार करने लगी है
किसी से
ना जाने क्यों...

अमित
(जून 2, 2010)
 

Sunday, January 24, 2010

क्‍या सबको शिक्षा दिला पयेगा यह विधेयक ?

- अमित
कितना अच्छा हो अगर देश के सभी बच्चों को स्कूल जाने का मौका और साधन मिले, शिक्षा मुफ्त और अनिवार्य हो। वह दिन कब आएगा, जब सभी स्कूलों में बच्चों को बैठने के लिए पर्याप्त कमरे होंगे, एक कक्षा में कम से कम एक शिक्षक होगा, सभी शिक्षकों को समुचित प्रशिक्षण प्राप्त होगा। जब स्कूल में एक पुस्तकालय भी होगा, शिक्षक ट्यूशन का धंधा नहीं करेंगे, स्कूलों के प्रबंधन व निगरानी में अभिभावक की भी हिस्सेदारी होगी और यह सब सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी होगी।
पिछले सत्र में राज्यसभा में बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार विधेयक-2008 पारित हुआ है और लोकसभा में पास होने के बाद कानून बन जाएगा। आजादी के बाद से ही शिक्षा को बुनियादी अधिकार बनाने और सभी बच्चों को मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा मुहैया करने की मांग सरकार से की जाती रही थी। अंततोगत्वा वर्ष 2002 में संविधान में 46वां संशोधन करके अनुच्छेद 21क जोड़ा गया, जिसमें छह से चौदह वर्ष की आयु समूह के सभी बालक-बालिकाओं के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मूल अधिकार के रूप में उपबंधित किया गया।
संविधान संशोधन के छह साल बाद यह विधेयक सदन में प्रस्तुत किया जा सका। संविधान संशोधन के पूर्व राज्य के नीति निदेशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 45 में कहा गया है, राज्य इस संविधान के प्रारंभ से 10 वर्ष के भीतर सभी बच्चों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए उपबंध करेगा। उन दस वर्षो की अवधि तो 1960 में पूरी हो गई। चूंकि यह राज्य के नीति निदेशक तत्व वाले भाग में था, इसलिए सरकार बाध्य नहीं थी। काफी जद्दोजहद के बाद वर्ष 2002 में शिक्षा का अधिकार संविधान के मूल अधिकारों में समाविष्ट तो हुआ, मगर यह अधिकार सभी बच्चों को न देकर केवल छह से चौदह वर्ष तक की आयु के बच्चों को मिला। आयु के मसले पर विवाद है। एक पक्ष का कहना है कि शिक्षा का मूल अधिकारों में शामिल होना एक बड़ी जीत है। दूसरा पक्ष कह रहा है कि राज्य के नीति निदेशक तत्व के अंतर्गत अनुच्छेद 45 अधिक व्यापक था। उन्नीकृष्णन फैसला (1993) भी इस दिशा में एक मील का पत्थर था, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 45 को अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण) के साथ देखा जाना चाहिए। अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि चौदह वर्ष तक प्रत्येक बच्चे को नि:शुल्क शिक्षा पाने का अधिकार है। वर्तमान अधिनियम का विरोध करने वालों का कहना है कि जन्म से चौदह वर्ष तक नि:शुल्क शिक्षा पाने का जो अधिकार पहले से मिला हुआ था, वह संविधान के 46वें संशोधन में सीमित होकर छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों के लिए ही रह गया है।
इस विधेयक की सकारात्मक बातों में सर्वप्रमुख है छह से चौदह वर्ष की आयु के प्रत्येक बालक (और बालिका) को आसपास के स्कूल में नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार मिलना। इस विधेयक में पड़ोसी स्कूल के रूप में सरकारी स्कूलों के साथ-साथ पूर्ण या आंशिक सरकारी अनुदान पाने वाले स्कूल तो हैं ही, पूर्णत: निजी, नवोदय, केंद्रीय और सैनिक विद्यालय भी शामिल हैं। सरकारी स्कूलों में सभी बच्चे नि:शुल्क पढ़ेंगे। अनुदान पाने वाले विद्यालयों को अनुदान की मात्रा के अनुपात में असुविधाग्रस्त समूह और दुर्बल वर्ग के बच्चों को भर्ती करना होगा। निजी स्कूलों को प्रत्येक कक्षा में कम से कम 25 प्रतिशत छात्र आसपास के इलाके से आने वाले उपरोक्त दोनों समूहों से होने आवश्यक हैं। प्रकारांतर से यह प्रावधान निजी क्षेत्र में आरक्षण का सूत्रपात करता है। निजी विद्यालयों को सरकार अपने द्वारा शिक्षा पर होने वाले प्रति छात्र खर्च के औसत के आधार पर नियत राशि देगी। स्थानांतरण प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र जैसे किसी भी दस्तावेज के अभाव में बालक का दाखिला रोका नहीं जा सकता।
विधेयक में कहा गया है कि देश के हर क्षेत्र में समुचित संख्या में और समुचित दूरी पर स्कूलों की स्थापना का दायित्व सरकार और स्थानीय निकायों का है। विधेयक में स्कूल के मान और मानक भी तय किए गए हैं। साथ ही स्कूल का अर्थ सभी मौसमों में सुरक्षा देने वाला ऐसा भवन अपेक्षित है, जिसमें प्रत्येक शिक्षक के लिए एक कक्षा, खेल का मैदान तथा लड़के और लड़कियों के लिए पृथक शौचालय हो। पाठशाला भवन में रसोई का भी प्रावधान है। इसका अर्थ है कि अब गली-कूचों में घटिया दर्जे के निजी स्कूल नहीं होंगे। कहा जा सकता है कि इस प्रकार के प्रावधान अनेक बार किए जा चुके हैं, मगर शिक्षा विभाग में व्याप्त लालफीताशाही और सरकारी शिक्षकों के उदासीन रवैये के चलते सारी योजनाएं कागजों पर धरी रह जाती हैं। यह सच है, मगर इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यह विधेयक दो कदम आगे की बात कर रहा है, क्योंकि एक तो यह संविधान के मूल अधिकार से संबद्ध है, इसलिए इसके उल्लंघन या अवमानना को न्यायालय के कठघरे में खड़ा किया जा सकता है और दूसरे इसमें एक विद्यालय प्रबंधन समिति का भी प्रवधान है, जो (सरकारी अनुदान प्राप्त नहीं करने वाले गैर-सरकारी विद्यालयों को छोड़कर) सभी स्कूलों में बनाना अनिवार्य होगा। इस समिति में कम से कम तीन-चौथाई सदस्य माता-पिता होंगे और उसमें भी असुविधाग्रस्त समूह और दुर्बल वर्ग के बच्चों के माता-पिताओं को समानुपातिक प्रतिनिधित्व मिलेगा।
असुविधाग्रस्त समूह और दुर्बल वर्ग के माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने के बदले अच्छी पढ़ाई की लालच में अनुदान प्राप्त और गैर-अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों में भेजेंगे। उन तथाकथित अच्छे स्कूलों में वंचित वर्ग के बच्चों से कैसा व्यवहार होता है, इस पर निगरानी रखने की आवश्यकता है। इसी क्रम में कहा जा सकता है कि कस्बों और गांवों में, जहां अब तक निजी स्कूल नहीं हैं, वहां अनेक निजी स्कूल भी खुल सकते हैं। ऐसे स्कूल संचालकों को अब फीस मिलने में जोखिम का डर नहीं होगा। उन्हें अधिक से अधिक संख्या में असुविधाग्रस्त समूह और दुर्बल वर्ग के बच्चों को भर्ती करना होगा। उनकी फीस तो सरकार देगी। इस परिप्रेक्ष्य में सरकारी स्कूलों का क्या होगा? ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्र में सरकारी विद्यालय वैसे भी बदनाम हैं - मास्टर नहीं आता, आता है तो पढ़ाता नहीं, आदि शिकायतें आम हैं। ऐसे में पालकों का रुझान निजी स्कूलों की ओर होना स्वाभाविक है। यही कारण है कि विधेयक के आलोचक इस पर निजीकरण का हितैषी होने का आरोप लगा रहे हैं।
खैर, अनिश्चितता के बावजूद कहा जा सकता है कि यह विधेयक भारत की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव का सूत्रपात करेगा। भारत की शिक्षा की भावी दिशा और दशा का समुचित अंदाजा इस विधेयक के कानून बनने के कुछ वर्षो बाद ही लगाया जा सकेगा।
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)
दैनिक जागरण, राष्‍ट्रीय संस्करण, 29 जुलाई 2009

Why PAPPU Failed ?


पैसों का खेल

- अमित
पिछले दो हफ्तों के दौरान भारत के खेल जगत में चार महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुई हैं। एक, बोनस, चिकित्सा बीमा, आदि नहीं मिलने के कारण भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने विश्व कप की तैयारी के लिए आयोजित शिविर में भाग लेने से इनकार किया। दो, भारत के सर्वोच्च रायफल महासंघ ने निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा को आगामी दो विश्वकपों में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। महासंघ की जिद के बावजूद अभिनव बिन्द्रा निशानेबाजी का टेस्ट देने को तैयार नहीं थे। तीन, पुरुषों के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत की महिला हॉकी टीम ने भी मेहनताना को लेकर विरोध जताया। चार, मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय महिला हॉकी टीम को संकट से उबारने के लिए एक करोड़ रुपये देने की घोषणा करने के साथ ही राजनेताओं से यह अनुरोध भी कर दिया कि वे खेलों को बख्श दें और उन्हें राजनीति का अखाड़ा न बनाएं।
इन घटनाओं पर विचार किया जाना इस लिए आवश्यक है कि यह खेलों के बदलते स्वरूप के साथ-साथ खिलाड़ियों के बदलते चरित्र को भी व्यक्त करती हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में कौन-सा पक्ष लेते हैं, या समाधान का कौन-सा रास्ता अपनाते हैं। इन घटनाओं के माध्यम से यह समझ लेना महत्वपूर्ण है कि अब हम खेलों और खिलाड़ियों को पुराने नज़रिये से नहीं देख सकते।
खेलों का प्राथमिक उद्देश्य मनोरंजन है। दर्शकों के मनोरंजन के लिये खेल खेलने से बहुत पहले ही मनुष्य अपने मनोरंजन के लिये खेलने लगा था। शायद मानव ने सभ्य होने की प्रक्रिया के दौरान ही अपने मनोरंजन के विभिन्‍न तरीके भी ईजाद कर लिये थे, खेल भी उन्हीं में से ही एक हैं। आगे चलकर खेलों को नियमबद्ध किया गया होगा और उनमें दक्षता के विकास के साथ ही खिलाडियों में अपनी दक्षता के प्रदर्शन का भाव जागृत हुआ होगा। यहीं से कहीं हम खेल स्पर्धाओं का आरम्भ मान सकते हैं। खेल स्पर्धाएं खिलाड़ियों और समुदाय, दोनों के लिए परस्पर पूरक हैं। इनसे खिलाडियों को समाज की स्वीकृति और प्रशंसा मिलती है, वहीं यह जनता के लिये मनोरंजन का एक साधन भी है। शुरूआती दौर में, हार-जीत को खेल का ही हिस्सा माना जाता था, यह न तो खिलाड़ी के लिये और ना ही प्रशंसकों के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न था। `खेल भावना´ शायद इसी को माना गया था। इसी वजह से ओलिम्पक खेलों के बारे में यह कहा जाता था, कभी-कभार अब भी दोहरा दिया जाता है, कि इसमें भाग लेना महत्वपूर्ण है - हार या जीत नहीं!
औद्योगिक क्रान्ति ने उत्पादन सम्बन्धों में आमूल परिवर्तन कर दिया। परिणास्वरूप समाज के भीतर सामन्ती कहे जाने वाले सम्बन्धों एवं व्यक्तियों का सामाजिक आचरण भी बदल गया। ज़मीन से लगाव, सामुदायिक सम्बन्धों को महत्व देना, अपने हर कार्य को आर्थिक लाभ-हानि के तराजू में न तौलना, हर वस्तु और सेवा को `पण्य माल´ न मानना, आदि मूल्यों को सामन्ती, और इसी लिये त्याज्य मान लिया गया। पूंजीवाद कहता है कि मनुष्य जो कुछ भी `करता´ है, वह `श्रम´ है और उसका एक बाज़ार मूल्य होता है, अत: व्यक्ति अपना श्रम बेच कर धन कमा सकता है। इसे `आजीविका उपार्जन´ कहा गया। आर्थिक व्यवहार का उद्देश्य केवल और केवल मुनाफा कमाना है। मुनाफा अभिमुखी आर्थिक व्यवहार ही समाजिक सम्बन्धों का आधार है और वही उनका नियन्ता भी है( अतएव व्यक्ति उसी काम की ओर प्रवृत्त होगा, जिससे उसे अधिक मुनाफा मिले। हम चाहें या न चाहें, पूंजीवादी दशZन के ये मूल्य समाज में स्थापित हो चुके हैं और सामन्ती माने जाने मूल्य बहुत पीछे छूट चुके हैं।
पूंजीवादी मूल्यों की इस रोशनी में अब हम खेलों को देखते हैं। खिलाड़ी अपने खेल के माध्यम से दशZकों का मनोरंजन करते हैं। मनोरंजन के लिये दर्शक पैसा खर्च करते हैं। इस प्रकार मनोरंजन एक व्यवसाय है, जिसका प्रबन्ध खिलाड़ी और दर्शक को एक स्थान पर लाने वाला तीसरा पक्ष करता है। वह तीसरा पक्ष अपने इस प्रबन्ध-कौशल का उपयोग लाभ कमाने के लिए करता है। चूंकि इस व्यवसाय में खिलाडियों की हैसियत `श्रमिक´ की है, उन्हें उनका पारिश्रमिक दिया जाता है। पारिश्रमिक लेकर खेलने वालों को पेशेवर खिलाड़ी कहा जाता है। प्रौद्योगिकी के विकास का पूरा दोहन करते हुए खेल व्यवसाय के प्रबन्धकों ने लाभ कमाने नए-नए स्रोत ईजाद कर लिये हैं, जैसे - टी. वी. पर प्रसारण अधिकार देना, खिलाड़ी के जूते, टोपी, चड्डी, बनियान, पतलून, खेल साधन (बल्ला, रैकेट, आदि) से लेकर खेल के मैदानों के चप्पे-चप्पे पर विज्ञापन प्रदर्शित करना, प्रतियोगिताओं के प्रायोजन अधिकार देना, एस. एम. एस. पर सवाल-जवाब, वगैराह।
यहां तक पहुंचते-पहुंचते पूंजीवादी अर्थतन्त्र पर्याप्त परिष्कृत एवं व्यापक हो गया है और अब लाभ कमाने के लिये वह उत्पादन करने जैसे पुरानी पद्धति पर निर्भर न रहकर नित् नये ऐसे व्यवसाय ईजाद कर रहा है, जिससे आसान तरीकों से अधिकाधिक मुनाफा कमाया जा सके। खेल ऐसा ही एक वर्धमान व्यवसाय है। यूरोपीय फुटबॉल लीगों में खिलाड़ियों को मोटी रकम देकर खेलने के लिये अनुबन्धित करने से लेकर इण्डियन प्रि‍मीयर लीग में बीसमबीस क्रिकेट खेलने के लिये दुनिया भर के खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त तक के विकासक्रम में खिलाड़ी जान गए हैं कि इक्कीसवीं सदी के पूंजीवादी अर्थ-सम्बन्धों में हम श्रमिक नहीं रहे, वरऩ `माल´ बन गये हैं। अब उनसे यह अपेक्षा करना बेमानी है कि वे किसी एक क्लब, क्षेत्र या देश से बन्धे रहें। अब खिलाड़ी खरीद-फरोख्त के लिये सरेआम अपनी बोली लगने से शर्मसार नहीं होते, बल्कि हॉकी, निशानेबाजी जैसे अबतक पूरी तरह व्यवसायिक नहीं हुए खेलों के खिलाड़ियों को तो शायद इस बात का खेद है कि हमारी निलामी क्यों नहीं की जा रही है।
खेलों में सफलता खिलाड़ियों पहचान और प्रतिष्ठा देती है, इस तरह कुछ खिलाड़ी सेलिब्रेटी का दर्जा पा लेते हैं। व्यवसाय के दौर में खेलने की दक्षता के प्रति दर्शकों का समर्थन एवं खिलाड़ियों के व्यक्तित्व के प्रति प्रेम को खेल के मैदान के बाहर भी भुनाया जाता है। जिसे अब `ब्राण्ड वैल्यू´ कहा जाता है। विज्ञापन इसका सर्वाधिक प्रचलित माध्यम है। खिलाड़ी खेल के माध्यम से अपनी `ब्राण्ड वैल्यू´ स्थापित कर लेते हैं और बाज़ार से उसका पूरा मूल्य वसूलना चाहते हैं।
किसी व्यवसाय के सभी स्वरूप समान रूप से लाभकारी नहीं होते। भारत में क्रिकेट का व्यवसाय सफल हो गया है, जिसमें प्रबन्धक, खिलाड़ी, प्रायोजक, आदि सभी हिस्सेदार भरपूर मुनाफा कमा रहे हैं। संयोग से हॉकी अब तक उस व्यवसायिक सफलता से वंचित है। भारत की हॉकी टीमों और खेल प्रबन्धकों के बीच का विवाद हॉकी के खेल को व्यावसायीकृत करने की दिशा में आगे बढ़ाएगा, क्योंकि खिलाडियों को अपना बाज़ार मूल्य, प्रबन्धकों को खेल का व्यवसाय करने का अवसर और प्रायोजकों-विज्ञापनदाताओं को अपने लिये एक नया बाज़ार चाहिये।
इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो शिवराज सिंह चौहान का अनुरोध इस दुविधा से उपजा वक्तव्य है कि व्यवसायिकरण के बाद सूत्र-संचालन किसके हाथ होगा र्षोर्षो उनकी यह मंशा कि राजनेता खेल प्रबन्धन से दूर रहें, बहुत ही पवित्र और भोली मनोकामना है, क्योंकि राजसत्ता के सूत्रधार के रूप में राजनेताओं के पास अनेक सूचनाओं और अधिकार के साथ ही कौशल भी होता है, इसी लिए तो सभी राजनीतिक दलों के नेता विविध खेल संघों के प्रमुख हैं या होना चाहते हैं। राजनेता के बाद, दूसरा स्वाभाविक दावेदार कार्पोरेट दिग्गज हैं। बुजुर्ग खिलाड़ी खेल संघों के प्रमुख नहीं बन सकते, क्योंकि खेलों का व्यावसायिक चरित्र इसे असम्भव बनाता है। केवल वे ही पूर्व खिलाड़ी खेल संघों में कोई निर्णायक भूमिका निभा पायेंगे, जो राजनीति या कार्पोरेट क्षेत्र में से किसी एक में जज़्ब हो गए हैं, क्योंकि अब खेल बाज़ार की वस्तु है।