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Thursday, January 1, 2015

मानवता की पुकार

- विनोबा

 (विनोबाजी का यह लेख आचार्यकुल पत्रिका (दिसम्बर 2014) के अंक में मैंने पढ़ा और महसूस किया कि इसे सबको साथ साझा करना चाहिए। आज जो धार्मिक और सामाजिक आचरण में अधिकाधिक विवेकशून्यता और असहिष्णुता का माहौल बनते जा रहा है, उस समय इसे पढ़ना मेरे खयाल से उपयोगी होगा।)

आज सारी दुनिया में एक चाह है। कोई शक्ति उसे खींच रही है। यह शक्ति है मानवता, जो मानव से कह रही है कि हे मानव तू अ-मानव बन गया है, अपनी यह अ- मानवता फेंक दे, अपना निज का स्वरूप देख और फिर से मानव बन! इस तरह मावता पुकार रही है, आह्वान कर रही है, जिसके कारण सबका झुकाव उस ओर हो रहा है। अब सारा मानव-समाज अत्यन्त वेग से बदलने वाला है।
एक बार एक जैन लड़के से पूछा "तू कौन है - जैन या मनुष्य?प्रश्न सुनकर लड़के को मज़ा आया। परन्तु उनने ज़रा भी विचार किए सीधा जवाब दिया - मैं मनुष्य हूँ। एक छोटा सा बच्चा भी इतना जानता है कि मैं सबसे पहले मनुष्य हूँ और बाद में और सबकुछ! परन्तु बड़े आदमी इतनी सीधी सी बात भी नहीं समझ सकते। मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धर्म क्या है, इसके चर्चा करते-करते नीतिशास्त्र ने कहा है, मनुष्यता! उस लड़के ने भी तो यही कहा। मनुष्यता के मुख्य धर्म को याद रखकर हमें संसार में सब काम करना चाहिए। हिन्दु, मुसलमान, ब्राह्मण, ब्राह्मणेतर सब याद रखें कि पहले हम मनुष्य हैं। मनुष्यता को छोड़कर हम हिन्दु, मुसलमान, ब्राह्मण, ब्राह्मणेतर कुछ भी नहीं रह जाते। हिन्दु भी तो आदमी ही होता है। जो आदमी नहीं वह हिन्दु कैसे? वैसे ही मुसलमान और अन्य भी कैसे? लड़ने की ज़रूरत पड़े तो लड़िए, झगड़िए, उसमें आपत्ति नहीं; पर मानवता मत छोडिए। सम्भवतः वह लड़का पूछेगा, क्यों जी, मनुष्यता लड़ना आता है? मानवता में लड़ना न आए फिर भी कम से कम लड़ने में तो मानवता रखें।
इसाई, इस्लाम, बौद्ध, वैदिक इन सब धर्मों के पास अपने-अपने अनुभव हैं, मानवता के अलावा। बहुत से लोग कहते हैं कि हमने मानवता का, करुणा का काम किया तो धर्मातरण किया। मैं कहूँगा कि मानवता तो कम से कम धर्म है। हिन्दू धर्म मानव-करुणा से कुछ अधिक है। इस्लाम भी उससे कुछ अधिक है। बैद्ध भी अधिक है और इसाई भी।
यह जो कुछ अधिक है, वह छोड़ दें, तो सब धर्मों का यह हाईएस्ट कॉमन फैक्टर (उच्चतम समान अंश) मानवता होगा। उसको कहते है हाईएस्ट (उच्चतम) लेकिन वह है लोएस्च (लघुतम)। भिन्न-भिन्न धर्मों में मानवता के अलावा कुछ गूढ़ आध्यात्मिक अनुभव होते हैं। अपना-अपना अनुभव छोड़ना नहीं चाहिए, बल्कि को भी जो अनुभव है, उसे सुनकर अपनी पुष्टि करनी चाहिए। आध्यात्मिक अनुभवों का अदान-प्रदान होना चाहिए।
किसी मनुष्य को उपासना का अध्ययन, उसका अनुभव और लाभ लेने से रोकना गलत है। हम यह नहीं कह सकेंगे कि तुम एक दफा तय कर लो कि तुम्हें राम की या उपासना करनी है या कृष्ण का नाम लेना है, इस्लाम का नाम लेना है या ईसा के पीछे जाना है, और यह तय कर लेने के बाद दूसरे मन्दिर में मत जाओ। ऐसा कहना उपासना को मानवता की अपेक्षा संकुचित करना है। उपासना मानवता से बहुत बड़ी चीज़ है। इस दृष्टि से इस सवाल पर बहुत गहराई से सोचना चाहिए।
यह ठीक है कि जिस उपासना में हम पले, उसका परिणाम हमारे ऊपर रहता है, उसका मिटाना नही चाहिए। पर दूसरी उपासना से लाभ नहीं उठाना, यह बात गलत है। उपासना को संकुचित नहीं बनाना चाहिए। उससे उसमें न्यूनता आ जाती है। उपासनाएँ एक दूसरे के लिए परिपोषक होती हैं।
शंकाराचार्य ने जोड़ने का ही काम किया। वे थे आद्वैत को मानने वाले, पर उन्होंने पंचायतन-पूजा सिखाई। अद्वैत में पंचायतन नहीं आता। लेकिन उन्होंने देखा, उस समय पाँच पंच थे, तो पंचायतान के रूप में सबको एकत्र ला सकते हैं। मानवता होगी तभी ऐसे प्रयत्न हो सरते हैं।
प्रथम हम मानव हैं और मानवता के नाते जो कर्तव्य है, वह हमारा प्रथम कर्तव्य है। उपासना के नाम से जो कर्तव्य आएगा, वह उसके बाद आएगा। दर्शन, सम्प्रदाय आदि से आने वाले कर्तव्य बाद में आते हैं। कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक-दूसरे के चर्चों में जाते नहीं। यानी उपासना में भी दर्शन-भेद, सम्प्रदाय-भेद होते हैं। हिन्दुओं में भी रामानुज सम्प्रदाय के लोग शंकर सम्प्रदाय के ग्रन्थ नहीं पड़ते। उनके स्तोत्र अलग होते हैं, इनके अलग होते हैं। मैंने ऐसे भी लोग देखें हैं, जिन्हें शांकर पन्थ की सभी टीकाएँ पढ़ीं हैं, लेकिन रामानुज का गीता भाष्य देखा तक नहीं है। एक से तो मैंने पूछा भी कि रामानुज का भाष्य क्यों नहीं पढ़ा? तो उसने कहा, वे भिन्न सम्प्रदाय के हैं इसलिए नहीं पढ़ा। इस प्रकार कहीं-कहीं दार्शनिक भेदों के कारण और उपासना भेदों के कारण भी भेद आता है। यह भेद एक ओर रखकर, मानवता को न खोते हुए उपासना करनी चाहिए।
उपासना यानी मानवता प्लस (अधिक) कुछ होना चाहिए। उपासना यानी मानवता मायनस (कम) कुछ, ऐसा नहीं होना चाहिए। आजकल ऐसा होता है कि हिन्दू मानवता से कुछ कम, मुसलमान यानी मानवता से कुछ कम; लेकिन होना यह चाहिए कि मानवता प्लस कुछ यानी हिन्दू, मानवता प्लस कुछ यानी मुसलमान, मानवता प्लस कुछ यानी ईसाई। ऐसा होता तब उपासना-भेद, दार्शनिक-भेद रहेंगे परन्तु वे गौण होंगे। रीति-रिवाज़ों के भेद तो बिल्कुल स्थुल गिने जाएँगे। इसलिए वे गौण माने जाएँगे। कुरान में पैगम्बर साहब ने कहा है, आप प्रार्थना के समय इस दिशा की ओर मुँह करते हो या उस दिशा की ओर, इसका ईश्वर की उपासना से कोई सम्बन्ध नहीं, धार्मिकता यानी सच्चाई, ईश्वर भक्ति। कुरान के इस वचन के बावजूद, दिशा के बारे में उनका विशेष आग्रह है। ये सब रस्म-रिवाज़ गौण हैं और वे जाने चाहिए। लेकिन उपासना-भेद और दार्शनिक-भेद, जो वैचारिक चिन्तन के विषय हैं, वे सब इकट्ठा कर एक परिपूर्ण दर्शन बनाया जा सकता है। इसलिए धर्म के मानी होने चाहिए मानवता प्लस और कुछ। मानवता कम पड़ेगी तो एक भी धर्म टिकेगा नहीं। हिन्दुस्तान के हम सब लोगों को - हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि जो मानवता को मानते हैं उन सब लोगों को यह भूमिका लेनी चाहिए कि हम सब एक हैं। और यह मानकर कि हम सब एक हैं, परस्पर विचार-विनिमय, चर्चा करनी चाहिए। एक-दूसरे के विचार सुन लेने चाहिए, यहाँ सब वाद खत्म होते हैं, ऐसा हितकर संवाद हम चलाएँ। आज कम से कम इतना होने कि मानवता को मानने वाले हम सब एक हैं।

Wednesday, December 22, 2010

साक्षात्कार

- अमित


(यह कहानी उस एकलव्य को समर्पित है, जिसने अकादमिक िशक्षण को नकार कर खुद की योग्यता साबित की थी।)


सायास मुस्कुराते हुए उसने नमस्ते कहा और कमरे में प्रवेश किया। सामने बैठे पाँच में से तीन को वो जानता था। निदेशक ने बाकी दो सज्जनों का नाम बताते हुए उसे अपना परिचय देने को कहा।
“जी, मैं इन्दौर का रहने वाला हूँ, यहाँ-वहाँ घूमने का शौक है इसलिए पूरा देश घूमा हूँ, पिछले तीन साल से ज्यादा समय से आपकी संस्था में लाईब्रेरी का काम कर रहा हूँ।''
“कर रहा हूँ" कहने में उसे संकोच हुआ, मगर कुछ और कहते न बना। परिचय के नाम पर क्या कहा जाए, उसे कभी समझ नहीं आया। उसकी जिन्दगी इतनी उलझन भरी रही है, इतने मोड़ों से ग़ुज़री है कि उन सब को गिनते हुए परिचय के रूप में उगलना उसे कभी गवारा नहीं हुआ। क्या मेरा नाम और सामने बैठा मैं ख़ुद परिचय के रूप में काफी नहीं? सवालों का सामना करने की तैयारी करते हुए उसने अपनी पीठ सीधी करने के लिए पहलू बदला।
“यहाँ काम करते हुए आपको क्या-क्या दिक्कतें हुई?'' निदेशक का सवाल।
खुद को नकारात्मक बातों से दूर रखते हुए उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया - “जी वो दिक्कत तो कुछ नहीं... सब ठीक था, सीखने के मौके थे सब। ...ठीक था।''
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाली एक प्रतिष्ठित एन.जी.ओ में लाइब्रेरियन का साक्षात्कार चल रहा है। सामने संस्था के निदेशक समेत पाँच विद्वान उसकी क्षमता को ठोक-बजा कर जाँच रहे हैं।
“अच्छा, तो आपने यहाँ क्या-क्या किया वो बताओ।'' निदेशक ने शायद अपने आप को दुरुस्त किया।
सब तो सी.वी में लिखकर दे रखा है। ये फालतू औपचारिकता निभा रहे हैं। पूछा है तो कुछ कहने के लिए उसने कहा, “जी, वो होशंगाबाद, भोपाल, इन्दौर में कम्प्यूटराईजेशन, क्लासिफिकेशन.... जी हमने खुद का क्लासिफिकेशन बनाया... फिर लाईब्रेरी के रूटीन काम....'' लगा कोई सुन नहीं रहा है। उसने ज़बान की लगाम थाम ली।
सामने दाएँ कोने से आवाज़ आई, “आपने लिखा है कि आपको पढ़ने में रुचि है, क्या-क्या पढ़ते हैं ?''
क्या जवाब दे, वह सोचने लगा कौन-कौन सी किताबों के नाम गिनाए? “कुछ किताबें, पत्रिकाएँ वगैराह, ई.पी.डब्ल्यू...''
फिर बिना रुके आवाज़ आई, "अभी आपने सेमिनार का कोई लेख पढ़ा हो तो उसका एब्स्ट्रेक्ट बताओ।''
उसके कानों को महसूस हुआ कि 'एब्स्ट्रेक्ट' पर कुछ ज़्यादा वज़न दिया गया है। उस आवाज़ में से तम्बाखू की सी बदबू भी महकी।
सेमिनार पढ़ना उसे कभी रुचिकर नहीं लगा, भारी-भरकम वाक्य और बेमतलब की लाग-लपेट। बुध्दिजीवियों की जुगाली। उसे कहना पड़ा “जी, सेमिनार तो काफी दिनों से नहीं पढ़ा।''
निदेशक ने राह दिखाई - “तो, ई.पी.डब्ल्यू. का बताओ''
कुँए से निकाल कर खाई में ला पटका। जवाब देने को वो मजबूर था। बांग्लादेश के महिला बचत समूहों के बारे में छपा एक लेख उसे याद आ गया। स्कूली बच्चे की तरह उस लेख का सार कहते हुए वह सोचने लगा कि कहीं लेखक का नाम-पता ना पूछ बैठें। उसका कहना खत्म हआ। एक बार फिर उसे लगा कि कोई सुन नही रहा।
दाएँ कोने से फिर आवाज़ आई, “एब्स्ट्रेक्ट का मतलब क्या होता है, जानते हैं?''
उसे समझ नहीं आया कि यह पीछे क्यों पड़ गया है? और इस सब का लाईब्रेरी के काम से क्या वास्ता? जवाब तो देना ही था, “जी, किसी लेख का सार। एब्स्ट्रेक्ट याने लेखक जो कहना चाहता है, ...जो कहने के लिए उसने लेख लिखा है वो... आठ-दस पंक्तियों में उसे पेश करना...'' अपनी सहज विनम्रता से उसने जवाब दिया।
“बस, आठ-दस लाईनें?'' दाएँ कोने ने पुष्टि करनी चाही।
“जी, मेरे खयाल से इतना काफी है। इससे ज़्यादा लिखेंगे तो आपको एक लेख ही लिखना पड़ेगा।'' सामने दाँए कोने वाले से नज़रें मिलाते हुए उसने जवाब दिया। जवाब देते हुए उसने 'आपको' पर कुछ ज्यादा ही जोर दे दिया था।
“एपिस्टोमोलॉजी के बारे में आप क्या जानते हैं?'' दाँए कोने वाले ने उसकी बखिया उधेड़नी शुरू की।
वो चक्कर में पड़ गया। उसकी छटी इन्द्रीय ने इशारा किया कि पिछला जवाब, या शायद जवाब की शैली दाएँ कोने में कहीं चुभ गई है। उसी की टीस 'एपिस्टोमोलॉजी' के रूप में मुखर हुई है।
“जी, माफ कीजिए, नहीं जानता।'' बेचारगी से वह इतना ही कह पाया।
“लाइब्रेरी साइंस में तो इसका काफी उपयोग होता है।''
“जी, मैंने इस बारे में कुछ नहीं पढ़ा।''
साक्षात्कार कक्ष में कुछ पल चुप्पी छा गई। वह दिमाग पर ज़ोर डाल कर सोच रहा था कि 'एपिस्टोमोलॉजी' के बारे में उसे कुछ सूझ जाए। कोशिश बेकार। कभी पढ़ा ही नहीं था। हार कर उसने पहलू बदला, अपनी पीठ को कुछ आराम दिया और सामने देख कर अगले सवाल का इन्तज़ार करने लगा।
दायाँ कोना फिर गूंजा, “स्टीफन हॉकिन्स के बारे में आप क्या जानते हैं?
सवाल सुनकर उसका आत्मविश्वास लौट आया। मुस्कुराते हुए उसने मुँह खोला, “जी उनकी किताब ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाईम लाइब्रेरी में है। ...उन्होंने आइंस्टाइन से आगे की कोई बात कही है...'' उसके शब्द उसे अन्धे कुँए में गूँजते सुनाई दिए।'' वह कुछ और कहना चाहता था, मगर सुनने वालों के भावहीन चेहरे पढ़ कर उसने चुप होना ही उचित समझा।
तत्काल निदेशक महोदय ने कहा, “टाईम, याने हिस्ट्री की बात करने वाले वो इतिहासकार हैं या...''
वह ताड़ गया, “जी, वो फिजि़क्स, मॉर्डन फिजि़क्स के हैं...'' एक साँस में कह तो गया, मगर यह न समझ पाया कि सवाल का आशय केवल यही जानना था कि स्टीफन हॉकिन्स किस विषय के विद्वान है? यह तो सबको पता है कि वे मॉर्डन फिजि़क्स के अग्रदूत हैं। उसने सोचा था कि स्टीफन हॉकिन्स द्वारा प्रतिपादित सिध्दान्तों के बारे में पूछा जा रहा है।
लेकिन यह बकवास पूछी क्यों जा रही है। अपने सी.वी. में वो साफ लिख चुका है कि उसके पास कोई डिग्री-डिप्लोमा नहीं है, वह उनमें विश्वास नहीं करता, जाति की ही तरह डिग्री-डिप्लोमा भी व्यक्ति की योग्यता को नापने के ग़लत पैमाने हैं। और ये संस्था, साक्षात्कार में जिसके कर्ता-धर्ताओं का वो जैसे-तैसे सामना कर रहा है, वे भी तो अपने शोधों-प्रयोगों के माध्यम से योग्यता के प्रचलित मूल्यांकन की पध्दति पर सवाल उठाते रहते हैं। आखिर ये मुझसे चाहते क्या हैं?
“ई.पी.डब्ल्यू. में लगातार लिखने वाले पाँच लेखकों के नाम बताओ।'' दाएँ कोने वाला उसे धराशायी करने पर तुला हुआ था।
वह कहना चाहता था कि मैं तो उसे लगातार पढ़ने वाला बन्दा नहीं हूँ, लिखने वालों के नाम मैं क्या जानूँ? मुझे तो आपका नाम सुनने के बाद अगले पल तक भी याद नही रहा। नाम में रखा क्या है, तुम साला काम देखो। आवेग को दबाते हुए उसने एक जाना-माना नाम लिया और चुप हो गया। इसके बाद वह दाएँ कोने वाले को यह कहने के लिए माक़ूल मौके का इन्तज़ार करने लगा कि कभी आप जरा उन लाईब्रेरियों में तशरीफ लाएँ, जिन्हें किताबों के बेतरतीब ढ़ेर में से मैंने खड़ा किया और चलाया है। इस नौकरी के लिए इतनी योग्यता पर्याप्त है। बाकी बकवास बन्द करो!
अब वह पूरी तरह परेशान हो चुका था।
“सोशल साइंस के पाँच प्रमुख जर्नलों के नाम बताओ।'' बीच में बेठै मोटे दढ़ियल ने मोर्चा सम्भालते हुए सवाल दाग़ा।
“जी, संस्था की लाइब्रेरी में आते हैं वो, या वैसे ही...''
“नहीं, जो भी हैं, आप नाम बताओ!''
“जी, वो ई. पी. इब्ल्यू., सेमिनार, एक वो आई.ई.एस.एच.आर., और एक वो इतिहास का भी है... वो नाम याद नहीं आ रहा...''
पिछले सात महीनों से वह बेरोज़गार है। यह बेरोज़गारी अवसाद बन कर उसके व्यक्तित्व में समा गई है। हँसी मुरझा गई है। रचनात्मकता की लौ बुझ गयी है। पिछले हफ्ते बेटे के जन्मदिन पर तोहफे का वादा पूरा न कर पाने का त्रास उसके दिमाग पर अब तक छाया हुआ है। इस नौकरी को पाने की चाहत में यहाँ तक आया है और इन अप्रासंगिक सवालों को झेल रहा है। हालाँकि वो जानता है कि ठेके पर काम करते हुए पिछले तीन सालों में इसी संस्था की लाईब्रेरी वो अच्छे से खड़ी कर चुका है, अब स्थायी कर्मचारी के रूप में उसे चलाने वाला भी वही सबसे बेहतर उम्मीदवार है। उसकी योग्यता इसी संस्था में साबित हो चुकी है।
“आपने करंट साइंस का नाम नहीं लिया, वो भी तो है।'' सामने दाएँ कोने से उसे सूचना मिली।
ये मुझे बुध्दू साबित करने पर क्यों तुला है? वह हड़बड़ा गया। सोचने लगा, करंट साइंस में तो विज्ञान के लेख ज्यादा आते हैं ना? वह कुछ कहने को हुआ, मगर ज़बान ने उसका साथ नहीं दिया। सामने चमचमाते स्टील के गिलास को उठा कर उसने दो घूँट पानी हलक में उण्डेला, तभी उसे शून्य में से आवाज़ आती सुनाई दी -
“ठीक है, विज्ञान के?''
उसी शून्य में उसने अपनी नज़र गडाने की कोशिश की। सामने कोई चेहरा, कोई आकार नज़र नहीं आ रहा था। कहीं पढ़ा था कि साक्षात्कार के समय सामने वाले से आँखें मिला कर बात करनी चाहिए। इससे आत्मविश्वास झलकता है। इसलिए, आत्मविश्वास झलकाने का दु:साध्य श्रम करते हुए उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया। मगर सामने अँधेरा था। तत्काल उसने मन नही मन अँधेरे की एक मानव-मूर्ति गढ़ ली और उस मूर्ति की सम्भावित आँखों में झाँकते हुए उसने कहना शुरू किया - “जी, डाउन टू अर्थ, वो तो पर्यावरण का है, एक करंट साइंस, एक हिन्दी का विज्ञान प्रगति...'' उंगलियों पर गिनते हुए उसने उस संस्था द्वारा प्रकाशित पत्रिका का भी नाम लिया और सहसा याद करते हुए उसने जोड़ा “...वो एक सलीम अली वाले ग्रुप का है मुम्बई से निकलता है... उसका नाम याद नहीं आ रहा..'' वह जान गया कि अवसाद उसकी स्मृति का काफी हिस्सा लील गया है।
सामने बीच में बैठा मोटा दढ़ियल बुदबुदाया, “बी.एन.एच.एस.?''
“जी, वही।'' उसने राहत की साँस लेते हुए कहा।
मगर हार मानने से पहले आखरी कोशिश कोशिश के रूप में उसने अस्त-व्यस्त होकर अवसाद से लिपटी अपनी स्मृति को व्यवस्थित करने के लिए दिमाग को तेज़ी से खंगालना शुरू किया। मनुष्यों के चेहरे रीते दिये की तरह बुझ गये। उसके स्थान पर स्याह आकृतियाँ हिलती-डुलती नज़र आईं। उसकी स्मृति की सतह पर घटनाएँ तैरने लगीं - वो तैयार हो कर रोज की तरह अख़बारों का पुलिन्दा हाथों में लिए लाईब्रेरी जा रहा है। दरवाज़े के चन्द कदम पहले अन्धेरे में घिरी एक आकृति उसे रोकती है। उसका हाथ स्याह आकृति की जेब से निकला एक सफेद कागज़ थाम लेता है। लगता है वह कागज़ कोरा ही है। नहीं, कुछ काली पंक्तियाँ भी है - काली पंक्तियाँ, उस हिलती-डुलती काली आकृति की तरह। खड़े-खड़े ही वो पढ़ने लगता है - “...संस्था के साथ आपका अनुबन्ध 31 मार्च को समाप्त हो गया है। आपकी सेवाओं की फिलहाल आवष्यकता नहीं है। जरूरत होने पर आपको पुन: अनुबन्धित किया जाएगा....''
उसे याद आता है कि आज 1 अप्रैल है। कहीं अप्रैल फूल तो नहीं बनाया जा रहा। मगर ये स्याह आकृति इंसान नहीं है, केन्द्र प्रभारी है - संस्था का प्रतिनिधि। इंसान मज़ाक करते हैं। संस्था मज़ाक नहीं करती, क्योंकि संस्था में इंसानियत नहीं होती।
“....तो भोपाल में भी ज़रूरत नहीं?'' उसके मुँह से शब्द फिसले।
“नहीं, आपका अनुबन्ध पूरा हुआ।'' स्याह आकृति ने जवाब दिया।
स्मृति के भूल-भूलैया सागर में गोते लगाते हुए वो उस स्याह आकृति का चेहरा याद करने की कोशिश कर रहा है। मगर चेहरे एक-से कहाँ रहते हैं। रंग बदलते रहते हैं, कभी सफेद, कभी ज़र्द, कभी सुर्ख़ तो कभी स्याह। चेहरों के आकार भी तो हमेशा बदलते रहते हैं, कभी फूले कुए कद्दू की तरह, कभी लटकी हुई लौकी की तरह, तो कभी खिले हुए कमल की तरह, कभी-कभी वो बेजान गुलाब की तरह मुरझा भी तो जाते हैं। बुलबुलो की तरह तैरती-बिखरती ज़िन्दगी में रंग-रूप बदलते चेहरों को कोई कितना याद रखे? अपनी स्मृति में उनकी कौन-सी पहचान स्थिर करे?
सवाल उसकी स्मृति में तैर रहे हैं। सवाल हवा में भी तैर रहे हैं। साक्षात्कार जारी है। उससे कुछ सवाल पूछे जा रहे हैं। उसे पता नहीं कि वो जवाब दे रहा है या चुप है। वह तो अपनी स्मृति के बिखरे मोतियों किसी तरह समेट कर व्यवस्थित करने की जद्दोज़हद कर रहा है। उसे पता है कि एक बार स्मृति का ठौर पाते ही वो अवसाद को अपने पर हावी नहीं होने देगा और उसके बाद सभी सवालों के जवाब भी दे पाएगा। उसके बाद ही.....
अभी तो वह अपनी स्मृति में एक उलझी घटना को सुलझाने में व्यस्त है।
स्याह आकृति को वह कह रहा है, “तो, अब मुझे काम करने की ज़रूरत नहीं?''
“नहीं।''
यह आदेश है या आग्रह, उसे समझ नहीं आता।
कागज़ की वह ठीक वैसी ही तह करता है, जैसा उसे दिया गया था। अपनी जेब के हवाले करता है। अख़बारों का पुलिन्दा स्याह आकृति के बढ़े हाथ थाम लेते हैं और अपने आप ही उसके हाथ जेब में चाभी तलाशने लगते हैं।
अन्धेरा छा गया है। उसे याद नहीं आ रहा है कि लाईब्रेरी की चाभी उसकी कौन-सी जेब में रखी थी। चाभी देते वक्त हुआ हाथों का कम्पन अब उसके दिल में महसूस होने लगता है।
साक्षात्कार चल रहा है।
कमीज़ की जेब में टंगी बेकार-सी कलम को व्यवस्थित करने के बहाने वो अपने दिल को सहलाता है, खुद को तसल्ली देते हुए दोहराता है कि वो घटना सात महीने पुरानी है। उसके बाद अब तक वो खुद को काफी तसल्ली दे चुका है। अब वक्त तसल्ली का नहीं, साक्षात्कार का है। मगर वो हार गया है। खुद से। खुद से किया अपना वादा वो नहीं निभा पाया कि आत्मविश्वास कायम रखना है। अवसाद को हावी नहीं होने देना है।
तभी उसे कुछ शब्द सुनाई देते हैं, जो कह रहे हैं कि साक्षात्कार पूरा हुआ। धन्यवाद।
वो सभी की ओर लाचारी भरी मुस्कान उछाल कर लौट जाता है।
बाहर आकर उसे पता चलता है कि लाईब्रेरियन के पद के लिए कोई और उम्मीदवार आया ही नहीं। वही इकलौता उम्मीदवार था। बाहर आकर वह महसूस करता है कि यहाँ थोड़ी-सी रोशनी है।
मगर भीतर कक्ष में उसे अयोग्य साबित किया जा चुका था। जबकि वो जानता है कि वो औसत से अधिक बुध्दिमान, कर्मठ और ईमानदार है। अपनी योग्यता इसी संस्था में वो पहले ही साबित कर चुका है।
घर पहुँचने के लिए वो बस पकड़ता है। करीब ढ़ाई-तीन घण्टे तक बस में बैठा रहता है। बस अन्धेरे में कहीं जा रही है। आँखें बन्द कर वो सोने की कोशिश करता है। उसे महसूस होता है कि बस के रास्ते में काफी उतार-चढ़ाव हैं। वह ध्यान देता है तो उसे महसूस होता है कि उसके रास्ते में उतार ही उतार हैं। उसकी बस अन्धेरी खाई में तेजी से उतरती जा रही है।
घर पहँच कर वो सो जाता है।
अगले दिन शाम को वो ईमेल पढ़ता है। निदेशक ने बड़े अपनेपन से लिखा है - 'अत्यन्त दुख से कहना पड़ रहा है कि पुस्तकालय प्रभारी के रूप में आपका चयन नहीं हुआ है। हम इस पद के लिए पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे।'
कुछ रूक कर वो आगे पढ़ता है - 'आपने संस्था की लाईब्रेरी बनाने में जो मदद की है, उसके लिए हम आपके आभारी हैं।'
उसके सामने कम्प्यूटर के मॉनिटर पर शब्द तैरने लगते है, तैरते हुए शब्दों के सागर में डूबने से पहले वो जल्दी से पढ़ जाता है - 'हम आपके उज्वल भविष्य की कामना करते हैं।'
मॉनिटर की रौशनी पिघल कर बहने लगी है। वह चश्मा उतार कर आँखें मलता है। अवसाद पिघल कर उसकी आँखों से बहने लगा है। उसकी जेब में रुमाल नहीं है। वो आँखों को कुछ देर दबाए रखता है। अवसाद का गुनगुना लावा उसकी उंगलियों को गीला करता हुआ कहीं खो जाता है।
एक बार फिर वो मेल पढ़ने की कोशिश करता है। स्याह लफ्ज़ बर्फ की तरह जम तो गए हैं मगर मॉनिटर पर रोशनी अब झील की तरह स्थिर है। बर्फ की मानिन्द सर्द शब्दों को वह फिर पढ़ता है - 'पुस्तकालय प्रभारी के रूप में आपका चयन नहीं हुआ है। हम इस पद के लिए पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे।' दूसरी बार पढ़ने पर भी शब्द और उनके मायने बदलते नहीं हैं।
'पुन: विज्ञापन प्रकाशित कर नए आवेदन आमंत्रित करेंगे' - उसके मन में कोई दोहराता है।
वो सोच रहा है एक बार फिर आवेदन किया जाए। अब वो तैयारी के साथ साक्षात्कार में जाएगा।
लेकिन इसी संस्था में सबके सामने वो साढ़े तीन साल में तीन केन्द्रों पर लाइब्रेरी बनाने और चलाने की अपनी योग्यता साबित कर चुका है। अब और कौन-सी तैयारी उसे योग्य साबित करेगी?
उसके सामने दो उपाय हैं, एक जो यह कि वो कुछ किताबें पढ़ कर जाए और सवालों के जवाब में किताबें ही उगल दे। शायद साक्षात्कार लेने वाले उससे किताबी बातें ही सुनना चाहते हैं, वह नही जो वह कहना चाहता है; या फिर कुछ और तरह का काम तलाश करे।
'कुछ और तरह का काम' याने क्या ?
पता नही।

सम्पर्क
एकलव्य परिसर
मालाखेडी,
होशंगाबाद ४६१००१
# 0 9424471247
amt1205@gmail.com

Thursday, June 3, 2010

वो पागल लड़की

ना जाने क्यों
हवा में
मुस्कान बिखेर देती है

ना जाने क्यों
अपलक देखती रहती है
अदृश्य आकृतियाँ
आसमान में

ना जाने क्यों
खींचती है आड़ी-तिरछी लकीरें
कागज़ पर, मेज़ पर
या अपनी हथेली पर

ना जाने क्यों
सिर झुका कर
वो कुछ सोचने लगती है
अचानक ही

ना जाने क्यों
कुछ ज्यादा ही
खुश नज़र आती है
वो इन दिनों

ना जाने क्यों
वो पागल लड़की
प्यार करने लगी है
किसी से
ना जाने क्यों...

अमित
(जून 2, 2010)